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07 June, 2021

गुनाह | कविता | डॉ शरद सिंह

गुनाह
      - डॉ शरद सिंह

खुद को स्थगित रखने से बड़ा
कोई गुनाह नहीं

स्थगित, थमा हुआ पानी
मारने लगता है सड़ांध

स्थगित, थमा हुआ दिन
भर देता है उकताहट से

स्थगित, पड़ी हुई रातें
तरसती हैं सपनों के लिए

स्थगित व्यवहार 
बढ़ा देता है दूरियां

स्थगित संवाद 
घोंट देता है गला ध्वनियों का

स्थगित लेखन
मिटा देता है शब्दों को

स्थगित होना 
यानी
जीते जी मार देना खुद को

जबकि नहीं है यह समय
स्थगित रहने का
क्योंकि 
विश्वास, प्रेम, सुकून
सब कुछ तो है स्थगित।
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