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03 June, 2021

आदिम बद्दुआएं | कविता | डॉ शरद सिंह

आदिम बद्दुआएं 
              - डॉ शरद सिंह

दीवार के उधड़े हुए प्लस्तर से
झांकती हुई ईटों की तरह
बीते हुए सुखद पल
झांकते हैं
रुलाते हैं
अहसास कराते हैं
उनकी पीड़ाओं का-
जिनके परिजन मारे गए
नात्ज़ी कंसंट्रेशन कैम्प में
जिनके परिजन मारे गए
हीरोशिमा, नागासाकी में
जिनके परिजन मर गए
 देश के बंटवारे में
जिनके परिजन मारे गए
ट्विन टॉवर पर हमले में
जिनके परिजन भूख से मर गए
सूडानी अकाल में
जिनके परिजन डूब गए
अवैध शरणार्थी नावों संग
जिनके परिजन मारे गए
इबोला, एंथ्रेक्स, कोरोना से

उन सभी बचे हुओं की 
पीड़ा, क्रोध और अकेलापन
महसूस करती हूं आज
दिल की गहराईयों से
आत्मा की ऊंचाइयों तक
और निकलती है
हर सांस में
आदिम बद्दुआएं उनके लिए
जिन्होंने रचा मौत का तांडव
महज़ राजनीतिक 
महज आर्थिक
महज अमानवीय  लिप्सा के लिए।
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