19 October, 2020

स्त्रीपाठ - 2 | स्त्री से | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | कविता


स्त्री से

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

वह जल की तरह
ढल जाती है उस आकार में
जो तुम देते हो-
पाषाण-अहिल्या
परितक्त्या-गर्भवती-सीता
पंचपति-द्रौपदी
उर्वशी या रंभा

देवताओं और मनुष्य के हाथों
छले जाने, शापित होने पर भी
जल की भांति बने रहना
कोई सीखे
स्त्री से।
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