मेरी याद
- डॉ शरद सिंह
तुम मुझे कैसे याद करोगे
पता नहीं
शायद रात से जूझते
दूज के चांद की तरह
या, दिन में
रेतीली आंधी में फंसे
सूरज की तरह,
जुगनू की तरह
या तितली की तरह,
या शेल्फ में सजी
किसी सजावटी क़िताब की तरह
सजा कर रखोगे
पर पढ़ोगे नहीं,
या फिर मेरी याद को
बेच दोगे किसी कबाड़ी को
रद्दी अख़बार की तरह,
क्या मेरी याद
कोई अर्थ रखेगी
मेरे जाने के बाद
तुम्हारे लिए?
तुमने तो भुला दीं
गिलोटिन से कटी गरदनें
और बोल्शेविक क्रांति भी
गुलामी की त्रासदी
और युद्ध का क़हर भी
फिर कैसे करोगे
मुझे याद
मेरी याद तो रहेगी बहुत छोटी सी
दूब की नोंक पे रखी
ओस की बूंद जैसी
क्या छू सकोगे
मन की उंगली से?
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