16 June, 2026

कविता | वे बूझ लेते हैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
वे बूझ लेते हैं 
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
शब्द टूटते हैं 
छूटते हैं 
रूठते हैं 
फिर मान जाते हैं, 
क्योंकि 
वे बूझ लेते हैं 
प्रेम को
बड़े प्रेम से।
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कविता | वे बूझ लेते हैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
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