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22 January, 2026

कविता | भ्रम -2 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
भ्रम-2
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

न चाहते हुए भी 
भ्रम के भंवर में
उतरते चले जाना
एक अनुभूति है
ब्लैकहोल सी
जहां
घोर अंधेरे में भी
होता है प्रतिबिंब-
मुक्ति का
साथ का
नई दुनिया का
धरती के कोलाहल से परे
शांति का।

पर टूटते ही भ्रम
दम घोंट देती हैं
ब्लैक होल की 
अदृश्य दीवारें

फिर भी मन
जा फंसता है 
उसी भ्रमजाल में
जिसे कहते हैं प्रेम।
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कविता | भ्रम -2 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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