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08 December, 2017

जाड़ा और जंगल ... डॉ शरद सिंह

Winter ... Poetry of Dr Miss Sharad Singh
जाड़ा और जंगल
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जाड़े की
गुनगुनी धूप में नहाए
जंगल में घूमते हुए
खुद में ही खुद को
ढूंढते हुए
लगता है अच्छा
कभी-कभी यूं ही
जंगल के फूलों से मिलना
यादों की अकुलाहट छोड़ कर
डालियां पकड़ने को
बचपन-सा कूदना, उछलना
भोर से परे, शोर से परे
अलसाए ताप के छोर से परे
देते हैं एक नई ऊर्जा
जाड़ा और जंगल
चाह की हथेली में
कोई ज्यों
लिख जाए शुभ, मंगल।
- डॉ शरद सिंह


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