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29 January, 2021

चैन है प्रवासी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत संग्रह | आंसू बूंद चुए

Dr (Miss) Sharad Singh


नवगीत

चैन है प्रवासी

- डाॅ सुश्री शरद सिंह


भीड़ में उदासी

ज़िन्दगी

बूंद-बूंद प्यासी।


धुंआ-धुंआ

उजियारा

कलछौंही लालटेन

उंगली की 

पोर से

छूट गई पेन


नेह भी कपासी

ज़िन्दगी

हो गई धुंआ सी।


पोर-पोर

पैनापन

यादों के जाल में

तैर गया

चेहरा

नयन ताल में


देह भी रुंआसी

ज़िन्दगी

है गहन व्यथा सी।


द्वार-द्वार

टूट गए

शुभलाभी सातिए

भीत की

दीवार ने

असगुन रचा लिए


चैन है प्रवासी

ज़िन्दगी

रह गई ज़रा-सी।

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)


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