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23 May, 2026
कभी घर नहीं मिला, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, शायरी
छप्पर नहीं मिला तो
कभी दर नहीं मिला
मानो यक़ीन, मुझको
कभी घर नहीं मिला
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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18 February, 2021
कभी घर नहीं मिला | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | ग़ज़ल संग्रह | पतझड़ में भीग रही लड़की
कभी घर नहीं मिला
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
छप्पर नहीं मिला तो कभी दर नहीं मिला।
मानो यक़ीन, मुझको कभी घर नहीं मिला।
जिसमें लिखा सकूं मैं रपट, खोए चैन की
पूरे शहर में एक भी दफ़्तर नहीं मिला।
आंखों की झील में हैं कई कश्तियां बंधीं
उतरे जो पार, कोई मुसाफ़िर नहीं मिला।
पिछले पहर की धूप भी कानों में कह गई
जब-जब किया तलाश, वो घर पर नहीं मिला।
उठने लगी हैं उंगलियां, जब से हरेक पर
पैरों में तब से एक भी झांझर नहीं मिला।
अकसर मिली है धूप मुझे राह में ‘शरद’
राही तो मुझसे एक भी आ कर नहीं मिला।
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(मेरे ग़ज़ल संग्रह 'पतझड़ में भीग रही लड़की' से)
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