जब से
दुख ने नाता जोड़ा
सपने चूर हुए
अपनों से
लगने वालों के
मुखड़े दूर हुए।
नागफनी-सा
दर्द उभर कर
मन में घाव उकेरे
भरी दुपहरी
घिर-घिर आए
पलकों तले अंधेरे
जब से
सबने रस्ता छोड़ा
घर नासूर हुए
सूने से
आंगन में ठंडे
दिन तंदूर हुए।
टुकड़ा-टुकड़ा
होता जीवन
हाथों फिसला जाए
पोर-पोर पर
दुखती चाहत
गुमसुम गीत सुनाए
आंगन में ठंडे
दिन तंदूर हुए।
टुकड़ा-टुकड़ा
होता जीवन
हाथों फिसला जाए
पोर-पोर पर
दुखती चाहत
गुमसुम गीत सुनाए
जब से
सूरज हुआ निगोड़ा
रंग बेनूर हुए
छाया से
लगते ये रिश्ते
नामंज़ूर हुए।
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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)
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नामंज़ूर हुए।
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