25 May, 2026

अब घर नहीं लगता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | शायरी

छत वही, दीवार औ दरवाज़ा वही है
फिर भी मेरा घर मुझे अब घर नहीं लगता 
रात भर बेचैनियां करवट बदलती हैं
अब मेरा बिस्तर मुझे बिस्तर नहीं लगता
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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