बुधवार, जून 27, 2012

बेड़नी नाचती है सारी रात ....


18 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थकता लिए सटीक पंक्तियां ... आभार

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  2. सच कहा है ... बच्चों के, अपनों के पेट का दर्द भी नहीं झेला जाता है मा से ...

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  3. बहुत सटीक और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

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  4. कौन नाचे है नचाये कौन ये मालिक जाने ,
    हम तो तेरे पैर की थिरकन पे थिरक बैठे ,,

    इस बार भी निः शब्द कराती खुबसूरत लाइन जहाँ कुछ भी कहना उचित नहीं लगता ..

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  5. Sharad singh, namaskar.
    bahut sundar srijan, badhai.
    प्रिय महोदय

    "श्रम साधना "स्मारिका के सफल प्रकाशन के बाद

    हम ला रहे हैं .....

    स्वाधीनता के पैंसठ वर्ष और भारतीय संसद के छः दशकों की गति -प्रगति , उत्कर्ष -पराभव, गुण -दोष , लाभ -हानि और सुधार के उपायों पर आधारित सम्पूर्ण विवेचन, विश्लेषण अर्थात ...
    " दस्तावेज "

    जिसमें स्वतन्त्रता संग्राम के वीर शहीदों की स्मृति एवं संघर्ष गाथाओं , विजय के सोल्लास और विभाजन की पीड़ा के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र की यात्रा कथा , उपलब्धियों , विसंगतियों ,राजनैतिक दुरागृह , विरोधाभाष , दागियों -बागियों का राजनीति में बढ़ता वर्चस्व , अवसरवादी दांव - पेच तथा गठजोड़ के दुष्परिणामों , व्यवस्थागत दोषों , लोकतंत्र के सजग प्रहरियों के सदप्रयासों तथा समस्याओं के निराकरण एवं सुधारात्मक उपायों सहित वह समस्त विषय सामग्री समाहित करने का प्रयास किया जाएगा , जिसकी कि इस प्रकार के दस्तावेज में अपेक्षा की जा सकती है /

    इस दस्तावेज में देश भर के चर्तित राजनेताओं ,ख्यातिनामा लेखकों, विद्वानों के लेख आमंत्रित किये गए है / स्मारिका का आकार ए -फॉर (11गुणे 9 इंच ) होगा तथा प्रष्टों की संख्या 600 के आस-पा / विषयानुकूल लेख, रचनाएँ भेजें तथा साथ में प्रकाशन अनुमति , अपना पूरा पता एवं चित्र भी / लेख हमें हर हालत में 30 जुलाई 2012 तक प्राप्त हो जाने चाहिए ताकि उन्हें यथोचित स्थान दिया जा सके /

    हमारा पता -

    जर्नलिस्ट्स , मीडिया एंड राइटर्स वेलफेयर एसोसिएशन

    19/ 256 इंदिरा नगर , लखनऊ -226016



    ई-मेल : journalistsindia@gmail.com

    मोबाइल 09455038215

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  6. sach me majboori insaan ko bibash kar deti hai kis had tak..sambednaaon ko jagaati bhavmayee rachna..sadar badhayee ke sath

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  7. आह ....हकीकत .का ब्यान सच में उम्दा ..

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  8. हकीकत बया करती करती
    अच्छी रचना, बहुत सुंदर

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  9. वर्तमान समय में भी यह कुप्रथा जारी है इससे बढकर और बडी विडंबना क्या होगी? टीवी सीरीयल पर इसके भयावह रूप को देखते ही रोंगटे खडे हो जाते हैं.

    रामराम.

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