कविता
भ्रम-3
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
यह भी तो
एक भ्रम है
कि सोचते हैं
ज़िंदगी को
जी रहे हैं हम
जबकि
जी रही होती है
ज़िंदगी हमें,
हमारी
एक-एक सांस
एक-एक पल
एक-एक ख़्वाब को
हमारे जाने बिना,
हमें
अपने ऋण से
करती हुई उऋण
जिस दिन
चुक जाता है
पूरा ऋण
उस दिन ज़िंदगी
कर देती है मुक्त हमें
हमेशा के लिए
और हमारे सहित सभी
रहते हैं इसी भ्रम में कि
हमने जी ली ज़िंदगी।
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कविता | भ्रम -3 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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