भ्रम
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
भ्रम
एक धोखा ही तो है
किसी के कारण
ख़ुद के लिए
बुना गया ख़्वाब
भ्रम टूटने पर
टूटता है ख़्वाब
एक कांच की तरह
और किरचें कर जाती हैं
लहूलुहान
आत्मा को
विश्वास को
इंसानियत को,
फिर भी,
भ्रम के जाल में फंसने से
खुद को
नहीं बचा पाता है
खास कर वो
जो होता है
नितांत अकेला
इस दुनिया में।
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कविता | भ्रम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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