17 September, 2012

तेरा नाम ले के .....


17 comments:

  1. बहुत सुन्दर.....

    सादर
    अनु

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  2. bahut sundar tasveer ...aur man ke udgaar bhi ....

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  3. टूटे हुए पत्ते का रंग अक्सर बदल ही जाता है ... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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  4. आपकी इस बात को मैंने भी दो दशकों पहले कभी एक गीत में कुछ यूँ कहा था :

    "आपके घर की हवा चली.
    मिली राहत, हेमंत टली.
    'पिकानद' हल्दी अंगों पर
    लगाकर लगती है मनचली."

    *पिकानद = वसंत ऋतु

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  5. खुबसूरत प्यारी सी प्रस्तुति.
    क्या खूब कहा है आपने.

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  6. बहुत सुंदर पंक्तियाँ...!!!!

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  7. बहुत सुन्दर |सागर की लहरों से निकल कर कभी -कभी इलाहाबाद के संगम की भी सैर कर लिया करिये |

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  8. स्मृतियाँ ही सुन्दरतम हैं।

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  9. हवा का रुख बदलता है, बदल पाई ऋतुएँ भी?
    बदल पायें तेरी यादें, ऐसी वो रुत कहाँ आई?

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  10. बेहतरीन प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद।

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  11. इश्क में बूदी पंक्तियाँ ...
    बहुत खूब ...

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  12. .

    वाह वाऽऽह… ! बहुत ख़ूब …

    लाजवाब हमेशा की तरह …

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  13. बहुत खूब।
    प्रतीक संचेती

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