16 January, 2021

बंधु, मेरे गांव में | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत | संग्रह - आंसू बूंद चुए

Dr (Miss) Sharad Singh

नवगीत

बंधु, मेरे गांव में

- डाॅ सुश्री शरद सिंह


शब्द

    परतीले हुए हैं

              जब कभी

दूर होते ही गए अपने सभी।


सूर्य फिसला 

उस पहाड़ी के शिखर से

जो नदी का भार भी

न ढो सका

बंधु, मेरे गांव में

कोई अभी तक

चैन से न हंस सका, 

न रो सका


दर्द 

    पथरीले हुए हैं

              जब कभी

टीस बोते ही गए अपने सभी।



रेत पिघली

नम हथेली की जलन से

और सीने पर उतरती

ही रही

बूंद के भ्रमजाल में

बांहे पसारे

नेह हिरनी रात भर 

सोई नहीं


रंग 

   सपनींले हुए हैं

              जब कभी

देह ढोते ही गए अपने सभी।

       

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)

15 January, 2021

धूप तले छांव | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत संग्रह | आंसू बूंद चुए

Dr (Miss) Sharad Singh

नवगीत

धूप तले छांव

- डाॅ सुश्री शरद सिंह


उंगली में सुई

चुभ गई

पोर-पोर में हुआ खिंचाव

             धूप तले छांव।


मोची का ठिया

ढिबरी-सा दिया

रात छुईमुई

        हो गई


घर-आंगन काला घेराव

             धूप तले छांव।


गेंदे की गंध

गजरे के बंध

फिर से अनछुई-

        सी हुई


मंडी में बिकी बिना भाव

             धूप तले छांव।


जीवन की शाम

कहे राम-राम

सूखी-सी रुई

      उड़ गई


पांव-पांव अंधियारे गंाव

             धूप तले छांव।

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)

14 January, 2021

दुखड़ा रोए इकतारा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत संग्रह | आंसू बूंद चुए

Dr (Miss) Sharad Singh

नवगीत

 दुखड़ा रोए इकतारा

- डाॅ सुश्री शरद सिंह


जिस्म हुआ पारा-पारा

      जैसे जलता अंगारा।


शब्द की किरचें

आंखों चुभतीं

दिल तक लहूलुहान हुआ

खारा जल

उंगली सहेजती

दीपक से भी तेल चुआ


सुख अनबूझ पहेली जैसा

      बूझे कैसे दुखियारा।



दिन की टांगें

सड़क नापतीं

शाम की क़िस्मत फुटपाथी

पीठ दिखा 

गुमशुदा हो गए

अपने मुंहबोले साथी


सब साज़ों से अलग-थलग हो

         दुखड़ा रोए इकतारा।



चांद सुलगता

कंदीलों में

तारों की चिंगारी उड़ती

किन्तु पेट के

‘ब्लैकहोल’ में

क्षुधा कील जैसी गड़ती


रात चुराए भोर का सूरज

       बाहर-भीतर अंधियारा।

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)

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13 January, 2021

तुम याद आए मीत | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत संग्रह | आंसू बूंद चुए

Dr (Miss) Sharad Singh

नवगीत

तुम याद आए मीत

- डाॅ सुश्री शरद सिंह


घाटी से

सिसकते

टेर जाए बांसुरी के गीत

        तुम याद आए मीत।


घूमते पेड़ों तले

पत्तियों पर नाम लिखते

           नेह डूबे दिन

मोर-पंखी आस्थाएं

           स्वप्न से पलछिन


चिड़ियों से 

चहकते

गुनगुनाए इक पुरानी प्रीत

         तुम याद आए मीत।



पत्थरों को डालते

झील में लहरें उठाते

            तोड़ते बन्धन

कृष्ण-राधा की कथाएं

            देखतीं दरपन


हल्दी से

महकते

छोड़ आए वस्त्र कोई पीत

          तुम याद आए मीत।

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)

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12 January, 2021

पत्र गैरों के | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत संग्रह | आंसू बूंद चुए

Dr (Miss) Sharad Singh
नवगीत

पत्र गैरों के

- डाॅ सुश्री शरद सिंह


धूल पर 

टिकते नहीं हैं

चिन्ह पैरों के।



उंगलियों के बीच

सूरज को दबाए

रोशनी से 

कसमसाती नींद

सिलवट छोड़ जाए


रास्तें 

बुनते रहे

संदर्भ सैरों के।



मौसमी मुस्कान

होंठों पर सहेजे

आंसुओं से

तरबतर रुमाल

किसके पास भेजे


डाकिया 

लाया हमेशा

पत्र गैरों के।

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)


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11 January, 2021

चौराहे का ज्योतिषी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत संग्रह | आंसू बूंद चुए

 

Dr (Miss) Sharad Singh

नवगीत

चौराहे का ज्योतिषी

- डाॅ सुश्री शरद सिंह


चौराहे का ज्योतिषी

     बांचे सब का भाग।


जुड़ी अदालत,

सुखिया की

पेशी का है दिन

मुंशी अभी पुकारेगा

होंठों रुपया गिन


बंटवारे का आरसी

    दिखलाता है दाग़।



बची सलामत 

डिहरी में

रहा न कोई दम

पटवारी ले जाए तो

जूठी पातर रम


गलियारे का परबसी

खाए बासी-साग।



मूड़ उठाए 

देख रहा

है मतलब का यार

धर दो चुनरी हाथ पर

यही ककहरा सार


अंधियारे का मावसी

    उजियारे का काग।

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)

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10 January, 2021

बांझ नींदों में | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | नवगीत संग्रह | आंसू बूंद चुए

Dr (Miss) Sharad Singh

एक और नवगीत मेरे नवगीत संग्रह "आंसू बूंद चुए" से ...

बांझ नींदों में

- डाॅ सुश्री शरद सिंह


बांझ नींदों में

सपन होते नहीं।


बंद पिंजरों से 

सुआ-मन

गौर से आकाश देखे

टिमटिमाते

छल-कपट के भाग-लेखे


दर्द के चेहरे

वृथा रोते नहीं।



रिक्त आंखों के 

धुंधलके

रास्ते के पोर गिनते

कसमसाते 

बचपने की याद बुनते


देह पानी में

मगर गोते नहीं।



जब उदासी ने 

पिरोए

ज़िन्दगी के वर्ष-महिने

छटपटाते

टीस के एहसास पैने


बंजरों में वन

कभी बोते नहीं।

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(मेरे नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ से)


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