31 May, 2021

ध्वनियां | कविता | डॉ शरद सिंह

ध्वनियां
     - डॉ.शरदसिंह
मुझे सुनना है-
एन. राजम का वायलिन
हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी
शिवकुमार शर्मा का संतूर
बीथोवन की सिम्फनी
बाख़ की कम्पोजीशन
मोरीत्सेविच का बैलेम्यू़ज़
ध्वनियां, ध्वनियां, 
ढेर सारी ध्वनियां

आए
समा जाए
मेरे कानों में
एक समुच्चय ध्वनियों का
ताकि दब जाए ध्वनि
असमय खोने से उपजे
अंतःरुदन की।
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30 May, 2021

एक आवाज़ | कविता | डॉ शरद सिंह

एक आवाज़
        - डॉ शरद सिंह
भरी दोपहर में
बादल छाए आज
गरजे भी, बरसे भी
छा गया अंधेरा
कमरे के एक कोने में
सिकुड़ कर बैठी मैं
करती रही प्रतीक्षा
कि आएगी एक आवाज़
देगी उलाहना मुझे-
क्यों नहीं जलाई लाईट?
कितना अंधेरा हैं कमरे में...

या फिर कहेगी-
चलो, बाहर बैठें, बरामदे में
चाय बनाऊं?
कुछ खाओगी?

या फिर पूछेगी वह आवाज़-
डर तो नहीं रहा है हमारा बेटू
बादल गरजने से?
देख, तेरी दीदू तेरे पास है...

ये तो थी बिन मौसम बरसात
क्या होगा
असली बारिश में?
जबकि-
बादल गरजते रहे
पानी बरसता रहा
गहन अंधेरे में 
डूबा रहा कमरा
नहीं आई कोई आवाज़
तरसते रहे कान
सुनने के लिए
दुनिया की सबसे मीठी, मधुर आवाज़
दुलार, प्यार और मनुहार भरी आवाज़
नहीं आई,
सन्नाटा चीरता रहा कलेजे को
रिसता रहा लहू
ताज़्जुब !
कि फिर भी ज़िंदा हूं मैं
उस एक आवाज़ के इंतज़ार में
स्याह अंधेरे कोने में सिमटी हुई।
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जो बचे हुए हैं | कविता | डॉ शरद सिंह | नवभारत में प्रकाशित

मेरी कविता "जो बचे हुए हैं" को आज 30.05.2021  को "नवभारत" के रविवारीय अंक में प्रकाशित किया गया है....

 हार्दिक आभार "नवभारत"🙏


29 May, 2021

सीने में समुद्र | कविता | डॉ शरद सिंह

सीने में समुद्र
           - डॉ. शरद सिंह
एक समुद्र दुख का
हहराता रहता है सीने में
टकराती हैं लहरें तट से
फिर चली आती हैं
रेत पर दूर तक
बिछा जाती हैं -
सीप, घोंघे और शंख
जिनमें रखे होते हैं
यादों के मोती,
प्रारब्ध के वलय
और पवित्र ध्वनियां
प्रेम की, अपनत्व की, 
जीवन के सपनों की
बेशक़, सुंदर बहुत सुंदर
पर 
होते हैं मृत
सीप, घोंघे और शंख
जिन्हें फेंक  देता है समुद्र
गहरे पानी से बाहर उलीच कर
उलीचने का यह क्रम 
नहीं होता कभी ख़त्म
सीने में रहते हैं शेष
अनंत जीवाश्म
जब तक देह में 
रहती है धड़कन
तब तक हहराता है
सीने में समुद्र
और उलीचता रहता है
निर्जीव पदार्थों को
यूं भी, उसका उलीचा जीवन
कभी जीवित नहीं रहता देर तक
दम तोड़ देता है छटपटा कर
जमने लगती है गाद (सिल्ट)
मगर न थमा है समुद्र
न रुकी हैं लहरें
किसी गाद से
न चाहते हुए भी
जीना पड़ता है 
जीवाश्मों के साथ ही।
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28 May, 2021

क़लम की नोंक पर ठहरी कविता | कविता | डॉ शरद सिंह

क़लम की नोंक पर ठहरी कविता
                      - डॉ शरद सिंह
मेरी क़लम की नोंक पर
ठहरी हुई
एक कविता
आतुर  है काग़ज़ पर उतरने को
इस कविता में है-
'प्रसाद' की 'कामायनी'
प्रेमचंद की 'पूस की रात'
गुलेरी की 'सुबेदारनी'
कमलेश्वर का 'राजा निरबंसिया'
टॉल्सटॉय की 'अन्नाकरेनीना'
गोर्की की 'मां'
सर्वेंटीज का 'डॉन क्विकजोट'
और
शेक्सपियर की 'डेसडिमोना' भी

यह कविता
कर सकती है प्रेम
लड़ सकती है लड़ाईयां
सुला सकती है कायरता
जगा सकती है विद्रोह

यह कविता जाति, धर्म, रंग से परे
संवाद है 
मनुष्य से मनुष्य का
यह कविता दिखा सकती है
व्यवस्था की ख़ामियां
शासन-प्रशासन की लापरवाहियां

इस कविता के पास
पांच उंगलियां और है एक अंगूठा
जिससे बन सकती है
तर्जनी भी और मुट्ठी भी
यह कविता 
सिखा सकती है जीना
और आवाज़ उठाना

इसीलिए
यह कविता ठहरी है
कलम की नोंक पर
कि लोग तैयार हो जाएं
इसे पढ़ने के लिए
कुछ कर गुज़रने के लिए।
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27 May, 2021

सपने | कविता | डॉ शरद सिंह

सपने
     - डॉ शरद सिंह
कुछ आम से सपने
कुछ नीम से सपने
कुछ पंछी के अधखाए 
अमरूद से सपने
कुछ गिलहरी के कुतरे सपने
कुछ ज़मीन पर उतरे सपने
कुछ पूनम से सपने
कुछ ग्रहण से सपने
कुछ सुलाए रखने वाले सपने
कुछ डरा कर जगा देने वाले सपने
मगर सपनों के लिए शर्त है
कि नींद आए
नहीं आते सपने रतजगे में
जैसे अमावस में नहीं आता चांद
जैसे काले बादल से नहीं गिरती धूप
जैसे पहले-सा नहीं जुड़ता टूटा हुआ कांच
जो देखना चाहे सपने
उसे करना होगा
नींद का जुगाड़

सपने देखना बुरा नहीं
बुरा है टूट जाना सपनों का
जागने से पहले ही।
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बचे रह जाना | कविता | डॉ शरद सिंह

बचे रह जाना
          - डॉ शरद सिंह

पतझड़ ने कर दिया पेड़ को ठूंठ
कुछ भी न बचा
जीवन का चिन्ह
सिवाय एक पत्ते के
जो फड़फड़ा रहा है
तीखी धूप और गर्म हवा में
ख़ुद को कोसता हुआ
कि वही क्यों रह गया शेष
जब सब झरे
तो झर जाना था उसे भी

जैसे सोचता था
वह मोची
जो बैठता था इस पेड़ के नीचे
कि जब ठूंठ हो गया पेड़
तो अब वह बैठेगा 
किसकी छाया में
जब फिर से -
चलने लगेंगी सड़कें
भरने लगेगा कोलाहल
टूटने लगेंगी चप्पलें
फटने लगेंगे जूते
तब उसके पास 
होगी निहाई
होगी रांपी
होगी हथौड़ी
होगी सुई
होगा धागा
नहीं होगी तो 
बस, पेड़ की छाया
मोची उदास है
पत्ता उदास है
उदास है पृथ्वी का हर कोना

पतझड़ पसर गया है
हवा गर्म हो चली है
पांव क़ैद हैं घरों के भीतर

पथरा रही हैं आंखें मोची की
सूख चली हैं नसें पत्ते की
दोनों टूट कर भी
नहीं टूटे हैं
पर क्यों?
वे भी नहीं जानते उत्तर
सिवा बचे रह जाने की पीड़ा के।
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