- डॉ शरद सिंह
जीने की ज़द्दोज़हद में फंसे
जो बचे हुए हैं
उन्होंने झेली है पीड़ा
अपनों के बिछड़ने की
अभी झेलना है पीड़ाओं के नाना रूप
पीड़ा अपरिभाषित होने लगती है
जब हाथ में आता है
पीले रंग का
आयताकार क़ागज़
यानी
जिनकी मृत्यु पर विश्वास न हो रहा हो
उनका 'डेथ सर्टिफिकेट'
उंगलियां कांपती हैं
नाम पढ़ा नहीं जाता है
जागता है एक अफ़सोस
कि काश ! उस नाम की जगह
मेरा नाम होता!
या फिर किसी का भी नहीं
न कोई आपदा होती
न ही अवसर
पीले क़ागज़ पर नाम लिखे जाने का।
पीड़ा तो अभी और बढ़ेगी
जब उस पीले क़ागज़ को लेकर
घूमना पड़ेगा दफ़्तरों में
ज़िन्दा बच जाने की सज़ा के बतौर।
पीड़ा तो अभी और बढ़ेगी
कलेजे को चीरती हुई
सॉ-मिल की आरे की तरह
दो फाड़ हो जाएगा हृदय
श्वेत पड़ने लगेंगी लाल रक्त कणिकाएं
फिर भी सांसें नहीं थमेंगी
अज्ञात अपराध की
ज्ञात सज़ा
अभी भोगनी जो है
पीले क़ागज़ के काले अक्षरों के साथ
... ताज़िन्दगी।
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