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28 May, 2021

क़लम की नोंक पर ठहरी कविता | कविता | डॉ शरद सिंह

क़लम की नोंक पर ठहरी कविता
                      - डॉ शरद सिंह
मेरी क़लम की नोंक पर
ठहरी हुई
एक कविता
आतुर  है काग़ज़ पर उतरने को
इस कविता में है-
'प्रसाद' की 'कामायनी'
प्रेमचंद की 'पूस की रात'
गुलेरी की 'सुबेदारनी'
कमलेश्वर का 'राजा निरबंसिया'
टॉल्सटॉय की 'अन्नाकरेनीना'
गोर्की की 'मां'
सर्वेंटीज का 'डॉन क्विकजोट'
और
शेक्सपियर की 'डेसडिमोना' भी

यह कविता
कर सकती है प्रेम
लड़ सकती है लड़ाईयां
सुला सकती है कायरता
जगा सकती है विद्रोह

यह कविता जाति, धर्म, रंग से परे
संवाद है 
मनुष्य से मनुष्य का
यह कविता दिखा सकती है
व्यवस्था की ख़ामियां
शासन-प्रशासन की लापरवाहियां

इस कविता के पास
पांच उंगलियां और है एक अंगूठा
जिससे बन सकती है
तर्जनी भी और मुट्ठी भी
यह कविता 
सिखा सकती है जीना
और आवाज़ उठाना

इसीलिए
यह कविता ठहरी है
कलम की नोंक पर
कि लोग तैयार हो जाएं
इसे पढ़ने के लिए
कुछ कर गुज़रने के लिए।
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