Sharad Singh
मित्रों का स्वागत है - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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लेखिका शरद सिंह का व्यक्तित्व एवं कृतित्व
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28 March, 2026
इंतज़ार रहता है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | शायरी
सुबह से शाम तेरा इंतेज़ार रहता है।
तू आएगा ये हवाओं का रुख भी कहता है।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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30 January, 2026
कविता | दिया कहता है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
कविता
दिया कहता है
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
टूटे दरवाज़े से
झांकता दिया
उम्मीद की
रोशनी को थामे
मानो कहता है
कि सब कुछ
नहीं हुआ है ख़त्म
अंधेरा गहरा ही सही
हारेगा ज़रूर
क्योंकि
अंधेरे की नियति है
हारना
और
उजाले की जीतना...
यदि ऐसा नहीं होता
तो सूरज
कभी नहीं उगता।
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22 January, 2026
कविता | भ्रम-3 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
कविता
भ्रम-3
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
यह भी तो
एक भ्रम है
कि सोचते हैं
ज़िंदगी को
जी रहे हैं हम
जबकि
जी रही होती है
ज़िंदगी हमें,
हमारी
एक-एक सांस
एक-एक पल
एक-एक ख़्वाब को
हमारे जाने बिना,
हमें
अपने ऋण से
करती हुई उऋण
जिस दिन
चुक जाता है
पूरा ऋण
उस दिन ज़िंदगी
कर देती है मुक्त हमें
हमेशा के लिए
और हमारे सहित सभी
रहते हैं इसी भ्रम में कि
हमने जी ली ज़िंदगी।
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कविता | भ्रम -3 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता | भ्रम -2 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
कविता
भ्रम-2
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
न चाहते हुए भी
भ्रम के भंवर में
उतरते चले जाना
एक अनुभूति है
ब्लैकहोल सी
जहां
घोर अंधेरे में भी
होता है प्रतिबिंब-
मुक्ति का
साथ का
नई दुनिया का
धरती के कोलाहल से परे
शांति का।
पर टूटते ही भ्रम
दम घोंट देती हैं
ब्लैक होल की
अदृश्य दीवारें
फिर भी मन
जा फंसता है
उसी भ्रमजाल में
जिसे कहते हैं प्रेम।
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कविता | भ्रम -2 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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16 January, 2026
कविता | भ्रम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
भ्रम
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
भ्रम
एक धोखा ही तो है
किसी के कारण
ख़ुद के लिए
बुना गया ख़्वाब
भ्रम टूटने पर
टूटता है ख़्वाब
एक कांच की तरह
और किरचें कर जाती हैं
लहूलुहान
आत्मा को
विश्वास को
इंसानियत को,
फिर भी,
भ्रम के जाल में फंसने से
खुद को
नहीं बचा पाता है
खास कर वो
जो होता है
नितांत अकेला
इस दुनिया में।
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कविता | भ्रम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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12 January, 2026
चूल्हा | कविता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह
भूख, गरीबी का किस्सा है, छै ईंटों का चूल्हा।
बेघर जीवन का हिस्सा है, छै ईंटों का चूल्हा।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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