11 September, 2026

जिस्म से बाहर | कविता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

जिस्म से बाहर 
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

लोग मानते हैं अपशकुन 
कांच के टूटने का
झाड़ कर, बुहार कर
फेंक देते हैं 
घर से बाहर उसकी 
किरच-किरच
टूटी हुई चूड़ियां भी 
मानी जाती हैं अपशकुन
टूटी हुई ऐनक 
टूटी हुई घड़ी 
नहीं रखा जाता इन्हें घर में 
पर टूटे हुए दिल को 
झाड़-बुहार कर फेंका 
नहीं जा सकता 
जिस्म के घर में 
धड़कता रहता है 
इस तरह
जैसे कोई हताहत 
रेंग रहा हो 
घिसट-घिसट कर 

क्या यह अपशकुन नहीं है 
बाकी ज़िंदगी के लिए?

काश!
टूटे हुए दिल को भी
झाड़-बुहार कर 
जिस्म से बाहर
फेंका जा सकता...।
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