एक आवाज़
- डॉ शरद सिंह
भरी दोपहर में
बादल छाए आज
गरजे भी, बरसे भी
छा गया अंधेरा
कमरे के एक कोने में
सिकुड़ कर बैठी मैं
करती रही प्रतीक्षा
कि आएगी एक आवाज़
देगी उलाहना मुझे-
क्यों नहीं जलाई लाईट?
कितना अंधेरा हैं कमरे में...
या फिर कहेगी-
चलो, बाहर बैठें, बरामदे में
चाय बनाऊं?
कुछ खाओगी?
या फिर पूछेगी वह आवाज़-
डर तो नहीं रहा है हमारा बेटू
बादल गरजने से?
देख, तेरी दीदू तेरे पास है...
ये तो थी बिन मौसम बरसात
क्या होगा
असली बारिश में?
जबकि-
बादल गरजते रहे
पानी बरसता रहा
गहन अंधेरे में
डूबा रहा कमरा
नहीं आई कोई आवाज़
तरसते रहे कान
सुनने के लिए
दुनिया की सबसे मीठी, मधुर आवाज़
दुलार, प्यार और मनुहार भरी आवाज़
नहीं आई,
सन्नाटा चीरता रहा कलेजे को
रिसता रहा लहू
ताज़्जुब !
कि फिर भी ज़िंदा हूं मैं
उस एक आवाज़ के इंतज़ार में
स्याह अंधेरे कोने में सिमटी हुई।
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