स्मृतियां
- डॉ शरद सिंह
धड़कती हुई
दीवारें कमरे की
दोहराती रहती हैं
अच्छी-बुरी,
खट्टी-मीठी
ख़ारी-कड़वी
स्मृतियां
हम जीते हैं स्मृतियों में
स्मृतियां जीती हैं हमको
और दीवारें
पान के पत्तों की तरह
उलटती-पलटती रहती हैं
स्मृतियों को
कि वे
रह सकें ताज़ा
है ज़रूरी दीवार पर
एक अदद खिड़की
ताकि
भरपूर सांस ले सके
स्मृतियों से भरा कमरा
एक निजी स्मारक की तरह।
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