देवशयनी
- डॉ शरद सिंह
सोने जा रहे देवता
चतुर्मास के लिए
गहरी, गाढ़ी नींद में
जब जाग रहे थे
फिर भी
नहीं रोका
मौत का ताण्डव
बच्चे अनाथ हुए
बड़े हुए बेसहारा
बेहाल मानवता
कराहती रही
सिसकती रही
तड़पती रही
एक-एक सांस के लिए
जबकि
जाग रहे थे देवता
उन दिनों
जब नहीं आई थी
देवशयनी एकादशी
संगमरमरी और ग्रेनाइट के
सुचिक्कन पत्थरों से बने
मंदिरों में
भजन-पूजन के शोर में डूबे
मालदार भक्तों पर आनंदित
सोते रहे
देवता
जागते हुए भी
चार माह की
घोषित निंद्रा
के बीच भी
चलती रही है दुनिया
चलती रहेगी दुनिया
क्या फ़र्क़ कि
देवता जागें
या सोएं
सच यही है-
हर आपदा में
मनुष्य ही सम्हालेगा
मनुष्य को
देवता नहीं।
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