दुआ है...
- डॉ शरद सिंह
ज़िंदगी
बन जाए जब एक बोझ
सांसे हो जाती हैं और चौकन्नी
चिपट जाती हैं सीने से
नहीं चाहती थमना
धड़कने
हो जाती हैं सजग
किसी भी क़ीमत पर
न रुकने को तैयार
जब देह ही
निभाने लगे शत्रुता
भागने लगे
निरुद्देश्य जीवन के पीछे
उस पर
कोई गिनाता रहे
ग़लतियां,
कोई फैलाता रहे
भ्रमजाल
सुरक्षित भविष्य के
सपनों के साथ
मैचमेकर बन कर
गोया
एक का एकाकीपन
मनोरंजन हो दूसरे के लिए
अपनत्व की शून्यता
झूठी मुस्कुराहटों के तले
दबी रहेगी कब तक
बस दुआ है कि
पत्थर हो जाए दिल
या
बंद कर दे धड़कना
ठीक इसी समय
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