चाहती हूं सिर्फ़ एक दिन
- डॉ शरद सिंह
मुझे चाहिए
जीवन का सिर्फ़ एक दिन
बिना किसी याद
बिना किसी बात
बिना किसी तारत्म्य
बिना किसी तादात्म्य
मुझे चाहिए
जीवन का सिर्फ़ एक दिन
जिसमें फूल हों
पत्ते हों
पक्षी हों
पहाड़ और झरने हों
लंबी सूनी निचाट सड़कें हों,
दूर तक देखूं
तो दिखाई दे सूरज का चढ़ना
सूरज का उतरना
और एक सुनहरा दिन
धूप खिली हुई
हवा में ठंडक
एक गुनगुनापन
न कोई साथ
न कोई पास
न कोई अपनापन
न कोई बेगानापन
न कोई दोस्ती
न कोई दुश्मनी
न कोई आशा
न कोई निराशा
न कोई नींद
न कोई सपना
न कविता, न कहानी
न प्रहसन, न उपन्यास
न काग़ज़, न लैपटॉप
न पेन, न की-बोर्ड
न शब्द, न अक्षर
कम्प्यूटर की
बाईनरी से दूर
गॉड पार्टिकल से परे
ज़िनोम, सिंड्रोम
कुछ भी नहीं
सूफ़ियाना इश्क़ की
तलाश में
एक एस्टरॉयड की भांति
अनंत अंतरिक्ष में
नक्षत्रों के पास से
गुज़रती हुई
सिर्फ़ एक दिन
जीना चाहती हूं -
निर्विरोध, निश्चेष्ट,
निर्विवाद, नि:शंक
अपने साथ,
अपने अस्तित्व को
बूझने के लिए
और चाहती हूं -
वह दिन हो
मेरा अंतिम दिन,
शून्य में विलीन हो जाने के लिए
प्रस्थान बिंदु।
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