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| Mere Khwabon Ke Shahar Ka ... Ghazal of Dr (Miss) Sharad Singh |
ग़ज़ल
मेरे ख़्वाबों के शहर का जो है पता तुझको
ज़रा बता भी दे अब उसका रास्ता मुझको
तू भी मिल-मिल के जमाने से आजमाता है
चाहता है जो सताना, तो फिर सता मुझको
तू नज़ूमी की तरह बांचता रहता है मुझे
मेरी तक़दीर में लिक्खा है क्या, बता मुझको
क्यूं लरज़ता है, झिझकता है, सहमता है भला
इश्क़ तुझको जो है मुझसे, तो ये जता मुझको
बंद बक्से में रखे ख़त की तरह क्या जीना
कर दे इक बार तो खुल के भी कुछ अता मुझको
- डॉ ( सुश्री ) शरद सिंह
