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05 February, 2021

ज़रा तुम कहो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | ग़ज़ल संग्रह | पतझड़ में भीग रही लड़की

 

Dr (Miss) Sharad Singh

ग़ज़ल

ज़रा तुम कहो

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


जो कहा न किसी ने ज़रा तुम कहो।

क्या  बनोगे मेरा  आसरा, तुम कहो।


मैं  तुम्हें  मान   लूं   प्यार में  नत गगन

और मुझको क्षितिज की धरा तुम कहो।


एक   स्पर्श   होता   है   सावन  भरा

क्या नहीं दिख रहा सब हरा, तुम कहो।


कल से  दिखने लगे इन्द्रधनुषी सपन

नींद में  रंग  किसने  भरा तुम कहो।


एक मरुभूमि  लहरों  में बदली है जो

अब उसे सज्जला,  निर्झरा  तुम कहो।


प्यार में डूब कर जो जिया हो ‘शरद’

वो किसी से भला  कब डरा, तुम कहो।

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(मेरे ग़ज़ल संग्रह 'पतझड़ में भीग रही लड़की' से)


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