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07 November, 2021

हादसे | कविता | डॉ शरद सिंह

हादसे
         - डॉ शरद सिंह

एक पेंसिल शार्पनर 
ही तो हैं हादसे
जो बनाते रहते हैं नुकीला
इस ज़िन्दगी को
 
नोंक 
बन जाए चुभने लायक
तो चलती रहती है
अजेय
कुछ देर

भोथरी हो जाए
तो जीने के प्रयासों की 
लिखावट
हो जाती है
भद्दी, बदसूरत
जिसे कोई
पढ़ना न चाहे

और
टूट जाए नोंक 
तो एक और हादसा
छील कर
उतार देता है
आत्मा की पर्तें भी

पेंसिल के अंतिम सिरे तक
जो बच रहता है
पी जा चुकी
सिगरेट के टोटे सा
मृत्यु के जूते तले
कुचले जाने तक
मिट्टी मिश्रित ग्रेफाईट की 
काली सींक की तरह
आशाओं की 
नर्म लकड़ी में दबी
लिखने और टूटने के
संघर्ष में
हादसों से
छिलती रहती है ज़िंदगी।
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