- डॉ शरद सिंह
पुराने अख़बार के
आख़िरी पन्ने के
निपट कोने में
छपे समाचार की भांति
रविवार का एक दिन और
तहा कर रख दिया जाएगा
सिरे से भुलाकर
इस डिज़िटल युग में
परन्तु मुझे नहीं भूलते
वे रविवार
जो कभी थे उत्सव की तरह
ब्लैक एंड व्हाईट टीवी में
दूरदर्शन पर प्रदर्शित
दोपहर की
फीचर फ़िल्म के साथ,
हम पॉपकॉर्न नहीं
रखते थे आलू चिप्स
ताज़ा तल कर
और याद करते
हर बार
वे एक-दो फीचर फ़िल्म्स
जो देखी थीं
पड़ोसी की बड़ी टीवी में
उनकी सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स की
धमक के साथ
वे रविवार
आज भी लगते हैं उत्सव-से
ओटीटी प्लेटफार्म की
उम्दा टेक्नोलॉजी के बावज़ूद
प्यारा-सा वह बुद्धू बक्सा
आज भी है गुदगुदाता
जब होते थे
परिवार के सारे सदस्य
कुछ घंटों के लिए ही सही
एक साथ
एक उत्सव की तरह
वैश्विक बाज़ारवाद में
जन्मे युवा
नहीं जान पाएंगे
इस उत्सव के बारे में
क्योंकि बाज़ार
सहेजता है
उन्हीं उत्सवों को
जो हों बिकाऊ
और उठा सकें
तेजी से
सेंसेक्स की लकीर को।
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