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27 June, 2025

कविता | प्रेम सिखा देता है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रेम सिखा देता है
           - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

वट वृक्ष की देह पर
बांधा गया
कच्चे सूतवाला
मनौती का धागा
अखिल ब्रम्हांड के
सुदृढ़ विश्वास को 
समेटे रहता है
अपने कमजोर
कोमल रेशों में

तुलसी-चौरे पर
जलाया गया 
माटी का 
नन्हा दीप
असंख्य रश्मियों से
आमंत्रित करता है
शुभ और मंगल को

आम्रपत्रों का तोरण
करता है सुनिश्चित
प्रतीक्षित ईष्ट के 
शुभागमन को

वह नहीं समझ सकता
इन चेष्टाओं के 
तत्व को, सत्व को
जिसे समझ ही न हो
प्रेमासिक्त विश्वास की,
जबकि
प्रेम सिखा देता है 
देवताओं को भी
रीझना, सींझना
और बन जाना
महारास रचाती
आत्मा का 
परमात्मा।      
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24 June, 2025

प्रेम कविता | उसे पढ़ता है प्रेम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रेम कविता
उसे पढ़ता है प्रेम
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

जुड़ी रहती है यादें 
अपने पुराने घर से
भले ही 
वह रहा हो
किराए का
पर 
वहां रहने का एहसास 
उस वक्त के लिए 
उसे अपना बना देता है
जैसे 
कोई सूखा हुआ फूल 
मिल जाता है 
अचानक 
दबा हुआ 
किसी पुरानी किताब में
फूल पाने का 
गुज़रा हुआ समय
हो जाता है चैतन्य 
भर जाता है ऊष्मा से
भले ही वह समय 
और वह 
फूल देने वाला भी 
अपना नहीं हुआ
लेकिन
पुराना घर हो 
या सूखा हुआ फूल
हमेशा लिखते हैं 
यादों की नई इबारत
उसे पढ़ता है प्रेम 
बड़े प्रेम से
वर्षों बाद भी।
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18 June, 2025

कविता | पुराना गोपन प्रेम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता 
पुराना गोपन प्रेम
     - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

आलमारी के 
सबसे ऊपरी तल्ले में 
रखे कीमती
पर न पहने जाने वाले
कपड़ों में
कभी-कभी 
जरूरी हो जाता है
फिनायल की 
गोलियां रखना
नहीं तो 
बंद अलमारी की सीलन
अपने पांव फैला लेती है 
कपड़ों की तहों में

उन तहों के बीच 
 कुछ यादें 
मिल जाती हैं अचानक
भीग जाता है मन
छूते ही 
पुराने रुमाल में लिपटे 
कागज की तहों में
कुछ रूमानी शब्दों को
 जो है अब बेमानी

गोया खुद ही छुप गया हो 
कपड़ों की तहों के बीच
अतीत की गर्माहट
सियाही की सरसराहट लिए
एक किताब में दबने से
आई हुई मोड़ों में
वर्षों से रह रहा है  
सब की दृष्टि से छुप कर 
पुराना गोपन प्रेम
इसीलिए तो आज तक  
फाड़ा नहीं जा सका
निर्जीव-सा किंतु स्पंदित
वह कागज का टुकड़ा

विषाक्त फिनायल की 
गोलियों के साथ
दिन, सप्ताह, वर्ष
व्यतीत करते हुए 
जीवित है आज भी
क्योंकि 
प्रेम कभी मरता 
जीता रहता है 
नितांत गोपनीयता के साथ
व्यक्ति की अंतिम सांस तक।
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कविता | इतराता है प्रेम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

इतराता है प्रेम
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

होती है अनेक
औचित्यहीन चेष्टाएं
कभी चिटकनी खोलना 
कभी टिक जाना 
दरवाजे से
और फिर अचानक 
दरवाजा लगाकर 
चिटकनी चढ़ा देना

यूं ही 
महसूस करना 
कि कोई सामने है
बालों को संवारना 
होठों पर 
मुस्कुराहट की 
रेखा का दौड़ जाना

यही तो है 
जागते स्वप्न का है 
लालित्य
जो अदृश्य को भी 
दृश्य में ढाल कर
खेलता है 
चेतना के अवचेतन से

और ठीक उसी समय 
इतराता है प्रेम 
अपनी अनंत, असीम
सम्मोहन शक्ति पर।      
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17 June, 2025

कविता | भोर का प्रेम | (सुश्री) शरद सिंह

भोर का प्रेम 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पक्षियों के कलरव से
जागती भोर
तोड़ती है
सूरज की अंगड़ाइयों को
गति पकड़ने लगती है
हवा भी

घरों के भीतर
खनखना उठते हैं बरतन
जल उठते हैं चूल्हे
पतीलियों में उबलती 
शक्कर, चायपत्ती
दूध और इलायची के संग
चाय छनती है
भाप उठती 
हो जाता है शुरू
कोलाहल

ठीक उसी समय
आता है प्रेम चाय में 
घुलकर
जहां मुस्कुरा कर 
परस्पर
एक-दूसरे को
थमाया जाता है प्याला
पारिवारिक भीड़ के बीच
प्याले को थामती हुई उंगलियां
चुपके से दबा देती हैं 
दूसरे की उंगलियों को
कौंध जाती है बिजली सी
दोनों की देह में
प्रेम मुस्कुराता है 
शालीनता से

किसी एक घर में
प्रेम और अधिक 
मुखर हो जाता है
और चाय से भी पहले 
शयनकक्ष में प्रवेश कर 
बालों को सहलाता है
माथे पर 
कुनकुनी धूप के 
एक गहरे चुंबन के साथ
जागता है

सो, भोर होते ही
जीवन में 
समाने लगता है प्रेम 
अपनी पूरी 
विविधता के साथ

बस, कोई उसे 
महसूस कर पाता है 
और कोई नहीं।
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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14 June, 2025

कविता | प्रेम होने दो अभिव्यक्त | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रेमकविता :
प्रेम होने दो अभिव्यक्त 
       - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

उसने कहा
उससे -
मुझे मत बताओ
कि
तुम्हें प्रेम है मुझसे
क्योंकि प्रेम
सदियों से
दुहराए जाते 
शब्दों से नहीं,
वह तो
व्यक्त होता है
अनुभूति की
राग-रागिनियों से
लय, माधुर्य
आरोह-अवरोह से,
प्रेम होने दो अभिव्यक्त 
भंगिमाओं के 
अलौकिक
पवित्र 
संगीत से
होने दो ध्वनित 
सांसों के तार-वाद्यों को
किसी कंदरा से लौटते
स्वर समूह की तरह
शब्दों के बिना
शब्दशः।     
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13 June, 2025

कविता | प्रेम में मगन धरती | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रेम में मगन धरती 
     - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

शब्द खो देते हैं
जब अपनी ध्वनियां
ठीक वहीं से 
शुरु होता है
अंतर्मन का कोलाहल
और गूंज उठता है
प्रेम का अनहद नाद
बहने लगता है
अनुभूतियों का लावा
धमनियों में
रक्त की तरह,
हलचल कर उठती हैं
धड़कनों की
टेक्टोनिक प्लेट्स
भूकंप आता है
हृदय की गहराइयों में
लेकिन
दरार आती है
परदृष्टियों की 
उथली सतह पर
किंतु प्रेम में मगन धरती 
डोलती रहती है 
अपनी ही धुन में।
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11 June, 2025

कविता | प्रेम एकाकी मन के लिए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रेम एकाकी मन के लिए
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

चिलचिलाती धूप में
सूखते गले को
मिल जाए जैसे
एक मुट्ठी छांह
और
एक घूंट पानी

बारिश की बाढ़
और 
गहरी सीलन में
चमके धूप की
कुनकुनी किरण

कड़कड़ाती ठंड में
फुटपाथ पर 
कांपती, ठिठुरती
देह को
कोई ओढ़ा दे कंबल

सूनी रसोई औ
छूंछे डिब्बों में
मिल जाएं
कटोरी भर आटा

तो फिर से
जाग उठता है 
विश्वास 
जीवन के प्रति
ठीक ऐसा ही तो होता है
प्रेम
एकाकी मन के लिए।     
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