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20 August, 2020

दोहे | सखी, दोस्त, मित्र पर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कुछ दोहे : सखी, दोस्त, मित्र पर..
 डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सखियां करती थीं सदा, दुख-सुख साझा रोज।
अब वो सखियां ग़ुम हुईं, मन करता है खोज।।

व्यस्त ज़िंदगी ले गई, सखियों से भी दूर।
इंस्टा पर या फेसबुक, मिलना हुआ ज़रूर।।

गुड्डे-गुड़िया ब्याहना, अब तक हमको याद।
हंसती हम सखियां सभी, होता जब संवाद।।

गूगल पर या ज़ूम पर, होती तो है बात।
लगे अधूरा किन्तु ज्यों, दूल्हा बिना बरात।।

कहते सब हैं - दोस्ती, जोड़े रखती तार।
दशकों गुज़रें या सदी, आती नहीं दरार।।

"शरद"  दोस्त हो या सखी, कभी न छूटे साथ।
भले दूर से ही सही, मिलें दिलों के हाथ।।
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