टूटे पत्ते की तरह
- डॉ शरद सिंह
भीड़
अब नहीं लुभाती मुझे,
तुम्हारे न होने का अहसास
होता है हर जगह
सज़ा है मेरे लिए
सामने दीर्घा में
तुम्हें न देख पाना
जब करता कोई
तुम्हारी चर्चा
"दीदी थीं" के संबोधन सहित,
चींख उठती है
मेरी अंतर्आत्मा
चुभने लगती हैं किरचें
शब्दों की,
उतर जाती है
बलात् ओढ़ी गई
मुस्कुराहट
मन लगाने को
घर से निकले क़दम
जब लौटते हैं घर
किसी आयोजन के बाद
कांपते हैं हाथ
खोलते हुए ताला
लड़खड़ाते हैं पैर
सूने घर में
क़दम रखते ही,
कोई नहीं जो
प्रतीक्षारत हो मेरे लिए
कोई नहीं
जो मेरी बातें सुने
पूछे मुझसे पूरा हाल
घर हो
या आयोजन
एक शून्य
रहता है चुभता
निरंतर
हर पल, हर कहीं
ढूंढती रहती हैं
मेरी आंखें
उस शून्य में भी
तुम्हें ही
संभव नहीं
तुम्हारा आना,
बुला लो मुझे
अपने पास
ख़त्म हो यातना का दौर
वरना
भटकता रहेगा
निरुद्देश्य जीवन
एक टूटे पत्ते की तरह
समय की आंधी में
थपेड़े खाता हुआ।
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