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22 May, 2021

अंधेरा घिरने पर | कविता | डॉ शरद सिंह

अंधेरा घिरने पर
            - डॉ शरद सिंह

जब दुख बड़ा होता है
तो बौने हो जाते हैं शब्द
इतने बौने
कि नहीं पकड़ पाते हैं
दुख की उंगली
सीने पर हिमालय-सा बोझ
ओढ़ाने लगता है अवसाद की चादर 
आंसू धोने लगते हैं 
सुख के निशानों को
तब 
उठाने लगते हैं सिर अनेक प्रश्न -
जीना अब किसके लिए
जीना अब क्यों
क्यों भटकना एक अदद
फैमिली पेंशन के लिए
क्यों लगाना दफ़्तरों के चक्कर
क्यों विश्वास करना किसी घोषणा का
क्यों चुकाना टैक्स दुनियाभर के
क्यों उम्मीद करना कि कोई
पोंछेगा आंसू आकर
क्यों ख़्वाब देखना कि कोई
देगा साथ जीवन भर

जबकि
साया भी साथ छोड़ देता है 
अंधेरा घिरने पर।
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