जिस्म से बाहर
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
लोग मानते हैं अपशकुन
कांच के टूटने का
झाड़ कर, बुहार कर
फेंक देते हैं
घर से बाहर उसकी
किरच-किरच
टूटी हुई चूड़ियां भी
मानी जाती हैं अपशकुन
टूटी हुई ऐनक
टूटी हुई घड़ी
नहीं रखा जाता इन्हें घर में
पर टूटे हुए दिल को
झाड़-बुहार कर फेंका
नहीं जा सकता
जिस्म के घर में
धड़कता रहता है
इस तरह
जैसे कोई हताहत
रेंग रहा हो
घिसट-घिसट कर
क्या यह अपशकुन नहीं है
बाकी ज़िंदगी के लिए?
काश!
टूटे हुए दिल को भी
झाड़-बुहार कर
जिस्म से बाहर
फेंका जा सकता...।
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