- डॉ शरद सिंह
आपस में न मिल पाना भी
मार देता है संवेदनाओं को
साक्षात देखना
चेहरा पढ़ना
हाथ मिलाना
स्पर्श के खेतों में उपजी
आत्मीयता की फसल
पेट भर देती है दिलों के
पर इन दिनों
पसरता जा रहा है सन्नाटा
नहीं खुलते दरवाज़े
नहीं खेलते बच्चे
कभी बालकनी तो कभी
छत पर से
परस्पर
पूछना कुशलक्षेम
लगता है महज़
वीडियो-का्ंफ्रेंसिग तरह
अच्छे दिनों का सपना लिए
चले गए अनेक
अनन्त यात्रा में
बचे हुओं ने छोड़ दी है
अच्छे दिन की आस
हाथ लगे हैं
ब्लैक फंगल वाले काले दिन
अब तो संघर्ष है
सिर्फ़ बचे रहने का
उद्देश्य संकुचित हो चला है
जीवन का
और दूर हो चले हैं हम
परपीड़ा, परदुख से
बढ़ते हुए मौत के आंकड़ों के बीच
शोकसंवेदना के लिए भी
न जा पाना
हमें कहीं कर न दे संवेदनाहीन
और लगाते रहें ठहाके बुरे दिन।
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