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30 June, 2023

कविता | प्रेम-मंत्रों से नहा कर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रेम-मंत्रों से नहा कर
 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पढ़ लेते हो तुम 
मेरी जिस कविता को 
देर रात गए 
अपनी व्यस्तताओं के बीच
पवित्र हो जाती है 
वह 
एक नभगंगा की तरह
देर तक झिलमिलाती है,
असंख्य ताराओं की 
धारा की तरह 
बहती है 
मेरे फेसबुक वॉल पर

दमकता है मन
चेतन अवचेतन के 
क्षितिज पर 
मध्यरात्रि के 
बृहस्पति तारे की तरह
सिर्फ़ तब
जब 
तुम पढ़ते हो
मेरे लिखे को
एक ऋचा की तरह
और हो जाती है
पूरी की पूरी रात,
निराकार 
प्रेम-मंत्रों से 
नहा कर वैदिक।
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29 June, 2023

कविता | किसी एक चेहरे के लिए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
किसी एक चेहरे के लिए
           - डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

बहुत जीवंत होता है प्रेम
तभी तो
हंसते हैं, मुस्कुराते हैं 
गाते हैं, गुनगुनाते हैं
अपनी ही धुन में 
खो जाते हैं
प्रेम करने वाले 
कुछ अलग ही 
हो जाते हैं।
जैसे होती हैं-
उफनती नदी
पनिहारे बादल
बलखाती पगडंडी
सरसराती सरपत
और हथेली की मेहंदी में
बड़े जतन से
छुपाया गया नाम

मेहंदी
शादी की हो 
यह जरूरी नहीं
प्रेम की मेहंदी
रचती है और गहरी
और छुपा हुआ नाम
गुदगुदाता रहता है
हथेली की लकीरों को 
देर तक,
ख़्वाब बुनती हैं 
उंगलियां
रेशमी ख़यालों से
और धड़कता है मौसम 
दिल के क़रीब आकर

प्रेम जीवंत जो होता है
बिल्कुल 
उस एक 
मुस्कुराहट की तरह
जो खिलती है 
सबके नहीं,
किसी एक चेहरे पर
किसी एक चेहरे के लिए।
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27 June, 2023

शायरी | शहर की आग | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अर्ज़ है -
जिस्म की आंच को,आंखों से हवा देते हैं। 
शहर की  आग  पे  आंखें  ही  मूंद लेते हैं।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
 
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24 June, 2023

शायरी | चलने देता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अर्ज़ है -
चंद   लम्हे   को   सम्हलने  देता।
दो क़दम  साथ  तो  चलने  देता।
स्याह मावस में चांद खिल उठता
ख़्वाब   से  ख़्वाब  बदलने देता।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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22 June, 2023

शायरी | मुश्क़िल है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अर्ज़ है -
जिनको रुतबे से मतलब है, मतलब है पोजीशन से, 
ऐसे लोगों से, या रब्बा ! साथ निभाना मुश्क़िल है।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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20 June, 2023

शायरी | मुश्क़िल है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

चार किताबें पढ़कर, दुनिया को, पढ़ पाना मुश्क़िल है।
हर अनजाने को आगे बढ़, गले लगाना मुश्क़िल है।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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17 June, 2023

शायरी | लिख दे मनवा एक कहानी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

लिख दे मनवा एक कहानी
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

जलते मौसम में पानी की, लिख दे मनवा एक कहानी।
एक कहानी ऐसी  जिसमें, हर  कोई हो  राजा-रानी।

ताल, तलैया, पोखर, नदिया, पानी से भीगे हर आखर
राग-द्वेष और दुनियादारी की बातें हों आनी-जानी।

बादल हो कान्हा के जैसा, बरसे तो हर पोर भिगोए
सूखे मौसम के बदले हो,  नन्हीं बूंदों की मनमानी।

फुरसत के पल में कुछ यादें, दिखलाती हैं दृश्य पुराने
जब होते थे दिन मोती-से, रात अंधेरी सुरमेदानी।

‘शरद’ अगर सब कुछ अच्छा हो, लगता है सब अच्छा-अच्छा
जागी आंखें भी करती हैं, सुन्दर सपनों की अगवानी।
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13 June, 2023

शायरी | बन के हमदर्द | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अर्ज़ है -
रात  दी  है,  चराग़  भी देते
ये  अंधेरा  बहुत   सताता है
ज़िन्दगी में कभी-कभी कोई
बन के हमदर्द क्यूं रुलाता है
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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11 June, 2023

कविता | उसे आती है शर्म | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
उसे आती है शर्म
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

एक घुमक्कड़ी
एक यात्रा और
ढेर सारी तस्वीरें
ढेर सारी नई ताज़ा, टटकी यादें
ढेर सारी खुशियां

पर एक न एक धब्बा
हर उस तस्वीर में
जो ली थी सड़क के किनारे,
कहीं गहरा, कहीं हल्का
कहीं बड़ा, कहीं छोटा
धब्बा !
एक चुभता हुआ धब्बा,
इश्क़ में मिले धोखे-सा
दिल तोड़ता धब्बा !!

हवा ने बुहार कर
कर दिया था किनारे
बड़े जतन से,
हवा नहीं उसे उठा कर
डाल जो नहीं सकती थी
उसे डस्टबिन में
बेचारी हवा!

बड़े यत्न से मिटाया मैंने
उस धब्बे को
अपनी तमाम तस्वीरों से,
हो गईं तस्वीरें साफ-सुथरी
पर 
हक़ीक़त की तस्वीर पर
वह धब्बा आज भी है
जिसे नहीं मिटा पा रही
झुंझलाई हुई हवा
और न मैं

वह धब्बा 
है हर सड़क के किनारे
चिप्स या कुरमुरे के खाली पैकेट,
गुटखे के रिक्त पाउच
और लापरवाही से फेंक दी गई
पानी की खाली बोतल के रूप में
ज़िंदगी की तस्वीर को बिगड़ता हुआ
हमारी सभ्यता की धज्जियां उड़ाता हुआ

हवा करती है किनारे
हर समय बुहार-बुहार कर
क्योंकि उसे आती है शर्म, 
पर हमें नहीं
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10 June, 2023

कविता | और हम हैं ख़ुश | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
और हम हैं ख़ुश 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

दो पहाड़
बीच से उगता सूरज
बीच बहती नदी
सूरज के बाजू में
उड़ते पंछी
नदी के बाजू  में
एक घर।

घर में एक दरवाजा
एक खिड़की
एक छत
एक चिमनी
घर के पीछे एक पेड़
आगे एक रस्ता
कुछ घास, कुछ फूल

यही तो थी बचपन की
परफेक्ट पेंटिंग
जिसे बनाया था
हम सभी ने
अपने-अपने बचपन में
और पाई थी शाबाशी
बड़ों से

अब हम बड़े हो चुके हैं
और सुखा रहे हैं नदियां
खोद रहे हैं पहाड़
काट रहे हैं पेड़
और
ढांक रहे हैं सूरज को
ज़हरीले प्रदूषण से,
रहा घर
तो वह भी बंट गया
टुकड़ों-टुकड़ों में

हम जी रहे हैं
अपने बचपन के विपरीत
और हमारे बच्चे
बना रहे हैं वही पेंटिंग
पाने को शाबाशी
हम प्रकृति-हंताओं से।

और हम हैं ख़ुश 
अपनी प्रगति पर
बचपन की उस पेंटिंग को
भुला कर।
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(*प्रकृति-हंता = प्रकृति को मारने वाले)
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09 June, 2023

कविता | बतियाती हैं मछलियां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बतियाती हैं मछलियां
   - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

नदी, तालाब, सागर, महासागरों
कुए, कुंड, पोखर और  झीलों में
तैरती हैं आवाज़ें
जब
व्हेल, शार्क, ट्राउट
पिरान्हा, गोबी, ईल
बतियाती हैं
छोटी बड़ी सभी मछलियां
करती है सचेत एक दूसरे को
जाल से
हार्पून और 
बिजली के करंट से।
डर लगता है सभी को 
शिकारी से

वे नहीं समझ पातीं 
क्यों मारते हैं 
भूमि पर रहने वाले 
जल में प्रवेश करके,
जैसी अपनी स्त्रियों को 
मारते हैं बिना वजह

क्या हम मछलियों में 
दिखती हैं 
उन्हें अपनी स्त्रियां?
यही चर्चा होती है 
टूना और सेल्मन मछली समूहों में

क्या उन शिकारियों को पता नहीं
कि जब मारी जाती है 
कोई ब्लू व्हेल या हैमर शार्क
तो उसकी चीत्कार से
उठती है तरंगे 
और उठती है सुनामी

आती है बाढ़ें नदियों में
मछलियों की आर्तनाद से ही
जबकि भूमि पर 
नहीं खड़कता एक पत्ता भी
एक स्त्री की नृशंस हत्या पर

मनुष्य 
क्या अब 
मनुष्य नहीं रहा?
ऐसा मैं नहीं, 
बतियाती हैं मछलियां।
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07 June, 2023

कविता | खारा है समुद्र | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

कविता
खारा है समुद्र
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

यह मत सोचो
कि जिनके आंसू
दिखते नहीं,
वे नहीं रोते

मनुष्यों की तरह
रोती हैं नदियां भी 
और फिर
रोती हैं मछलियां 
सीपियां, घोंघे
कछुए, मगर
घड़ियाल, 
केकड़े,  झींगे

यहां तक कि
रोते हैं भंवर
और
तलछट की रेत भी

यानी रोती हैं नदियां
सुबक-सुबक कर
अपनी पूरी सम्पूर्णता से
तभी तो उठती हैं हिलोरें
पर नहीं दिखते आंसू
न नदियों के
और न नदी-बाशिंदों के

दरअसल,
बहा ले जाती हैं
लहरें
उनके आंसुओं को
दूर
बहुत दूर
हां !
तभी तो खारा है
समुद्र।
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06 June, 2023

शायरी | कहां खो गया | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


अर्ज़ है -
जिस काग़ज़ पे लिखा हुआ था
एक पता वो ख़ुशियों वाला।
जाने वो कब, कहां  खो गया
हमने   था   ख़ूब   सम्हाला।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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05 June, 2023

विश्व पर्यावरण दिवस | शायरी | खो गया वो घाट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

खो गया वो घाट 
          - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

खो गया वो घाट जिस पे बैठ कर सपने बुने थे।
प्रेम भीगे शब्द अपनी उंगलियों से तब गुने थे।

कट गया जंगल कि जिसमें घूमती थी एक हिरणी
पंछियों के साथ उसने प्रिय हिरण के स्वर सुने थे।

वो नदी, झरना, वो पोखर, सूख कर रेतिल हुए हैं
कौमुदी और शंख, सीपी भी वहीं जा कर चुने थे।

फूल महुए का निखरता, गंध मादक फैलती थी
वो सुहाने दिन सुलगती धूप में भी कुनकुने थे।

नष्ट कर  पर्यावरण  को, बस्तियां  फैला  रहे हैं
सोचती है अब "शरद'' ये, क्या हरित दिन पाहुने थे?
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03 June, 2023

कविता | बधाई हो हमें | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बधाई हो हमें !!! 
      - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

आपस में टकराईं
तीन रेलें
मारे गए लोग
और शुरू हो गया 
खेल आंकड़ों का
अब रह जाएगी-
मृतकों की संख्या
और मुआवज़े की घोषणा

जैसे
खुलेआम मारी गई
एक नाबालिग लड़की
बने रहे सब तमाशबीन
फिर उठने लगे स्वर-
राजनीति के

दुर्घटना में राजनीति
हत्या में राजनीति
राजनीति यौनशोषण में भी

अब
लहू की नदी
हमें डराती नहीं
दरिंदगी से उठती चींख
हमें चौंकाती नहीं
औरतों की लगती बोलियां
हमें लजाती नहीं

वाह!
हम हो गए हैं प्रबुद्ध
सही-सही पढ़ लिया 
पाठ हमने,
भुलाकर इंसानियत
बन गए राजनीतिक प्यादे
और
सीख लिया है हमने -
हासिल कैसे किया जाए
किसी की आपदा में 
अपना अवसर।

बधाई हो हमें !!!

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Painting by Dr (Miss) Sharad Singh
                 डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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01 June, 2023

शायरी | पेट की ख़ातिर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अर्ज़ है -

नन्हा लड़का पेट की ख़ातिर, पंक्चर जोड़ रहा है।

लाचारी में  उसका बचपन,   उसको छोड़ रहा है।

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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शायरी | पहले भूख को रोटी दे दो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अर्ज़ है -
पहले भूख को रोटी दे दो, फिर तुम दीगर बात करो।
बड़ी नहीं तो छोटी दे दो, फिर तुम दीगर बात करो।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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