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05 August, 2021

फॉसिल | कविता | डॉ शरद सिंह

फॉसिल
       - डॉ शरद सिंह

सावन, भादों
क्वांर, कार्तिक
वसंत, पतझड़
सारे महीने
सारे मौसम
मेरे भीतर रह कर
देते रहते हैं दस्तक
बाहर आ कर
चेहरे से फूट पड़ने को
बारहमासी बन कर

परन्तु 
लग गया है जंग
मन के दरवाज़े के
कब्जों में
पथरा गई हैं
पल्लों की लकड़ियां
उन पर पड़ने वाली थाप
अब नहीं होती
ध्वनित, प्रतिध्वनित

हर मौसम
बनता जा रहा
फॉसिल
दुख की चट्टानों में दब कर
सीने की तलहटी
बहती आंसुओं की नदी में
डूबता-उतराता
हर पल है
हज़ार-हज़ार साल जैसा।
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9 comments:

  1. मेरी कविता को चर्चा मंच में स्थान देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद एवं आभार मीना भारद्वाज जी 🙏

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  2. "हर मौसम
    बनता जा रहा
    फॉसिल
    दुख की चट्टानों में दब कर
    सीने की तलहटी
    बहती आंसुओं की नदी में
    डूबता-उतराता
    हर पल है
    हज़ार-हज़ार साल जैसा।" - बहुत ही अनूठा बिम्ब और अनूठे बिम्ब के साथ-साथ वर्तमान जीवन की दिग्भ्रमित एकरसता का सार .. शायद ...

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  3. ओह...मन की गहराई को छूकर लौटी रचना... मन से वार्तालाप करती हुई...। खूब बधाई

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  4. उदास मन का दर्द गहनता से उकेरा है ।

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  5. दुःख जब घर होता है तो पल पल हज़ार साल जैसा ही लगता है । बहुत मर्मस्पर्शी रचना ।

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  6. बेहद हृदयस्पर्शी सृजन।

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  7. दुखी मन के भावों से बुनी हृदयस्पर्शी रचना।

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  8. अंतर्वेदना का समय के अलावा कोई मरहम नहीं | मर्मान्तक सृजन पर शब्द नहीं मिल रहे | अपना ख्याल रखिये | आपका जीवन अनमोल हैं |

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