पृष्ठ

13 May, 2021

सोचा न था | कविता | डॉ शरद सिंह

सोचा न था
         - डॉ शरद सिंह

कभी सुबह ऐसी भी होगी
सोचा न था
तुम बिन सांसें लेनी होंगी
सोचा न था
आज भी छत पर फूल खिला है
गेंदे का
आज भी छत पर फूल खिला है   
गुड़हल का
आज भी श्यामा-तुलसी 
भीनी महक रही
आज भी छत पर गौरैया हैं
चहक रहीं
सिर्फ़ नहीं हो तुम
तो है सूनी पूरी छत
"बेटू", "बहना" सुनने को हैं
कान तरसते
वो धड़कन हैं कहां ? कि जिनमें
मेरे प्राण थे बसते
दुनिया भी मिल जाए 
पर जो नहीं हो तुम तो
नहीं शेष है मेरे हाथों में
अब कुछ भी

कोरोना बन सांप
तुम्हें डंस लेगा, दीदी
और बिछुड़ना होगा हमको
इतना ज़ल्दी
कभी अकेले जीना होगा
सोचा न था
कभी अकेले रहना होगा
सोचा न था।
------------------

#शरदसिंह #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह
#SharadSingh #Poetry #poetrylovers
#World_Of_Emotions_By_Sharad_Singh

26 comments:

  1. कभी हरिवंशराय बच्चन जी ने अपनी जीवन-संगिनी श्यामा जी के विछोह के उपरांत अनेक अवसाद से ओतप्रोत कविताएं रची थीं जो अन्य कुछ नहीं, उनके संतप्त हृदय का क्रंदन ही थीं (निशा निमंत्रण, एकांत संगीत एवं आकुल अंतर में संकलित हैं वे कविताएं)। आपकी मनःस्थिति भी ऐसी ही है शरद जी जो आपकी काव्याभिव्यक्तियों में स्पंदित हो रही है। मेरी यही प्रार्थना है कि आपके शोकाकुल मन को कुछ शांति मिले। इतना और कहना है कि जैसे बिछुड़ने वालों की ज़िन्दगी क़ीमती थी, वैसे ही आपकी ज़िन्दगी भी क़ीमती है। अपना हर तरह से ख़याल रखिए।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धैर्य बंधाने के लिए हार्दिक धन्यवाद जितेन्द्र माथुर जी 🙏

      Delete
  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" शुक्रवार 14 मई 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. "पांच लिंकों का आनन्द" में मेरी कविता शामिल करने के लिए हार्दिक धन्यवाद यशोदा अग्रवाल जी 🙏

      Delete
  3. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 14-05-2021) को
    "आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ:"(चर्चा अंक-4065)
    पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित है.धन्यवाद

    "मीना भारद्वाज"

    ReplyDelete
    Replies
    1. चर्चा मंच में मेरी कविता शामिल करने के लिए हार्दिक धन्यवाद मीना भारद्वाज जी 🙏

      Delete
  4. कोरोना बन सांप
    तुम्हें डंस लेगा, दीदी
    और बिछुड़ना होगा हमको
    इतना ज़ल्दी
    कभी अकेले जीना होगा
    सोचा न था
    कभी अकेले रहना होगा
    सोचा न था।---बेहद मार्मिक।

    ReplyDelete
    Replies
    1. यही मेरे जीवन का दुखद सत्य है संदीप जी 🙏

      Delete
  5. कोरोना ने ना जाने कितनों को निगल लिया

    ReplyDelete
    Replies
    1. दुर्भाग्य कि प्रतिदिन निगल रहा है प्रीति जी 🙏

      Delete
  6. निशब्द हूँ....कोरोना न जाने कितनों को डसेगा..

    ReplyDelete
    Replies
    1. आंकड़े बढ़ रहे हैं और अपने कम हो रहे हैं... काश यह सच न होता विकास जी 🙏

      Delete
  7. हृदय स्पर्शी रचना

    ReplyDelete
  8. आप का लिखा हमें रूला सकता है तो आपकी व्यथा की थाह क्या होगी।
    बस यही कहूंगी आप धैर्य रखें उनके अधूरे कामों को पूरा करने का दृढ़ संकल्प लें, उनकी रचनाओं और साहित्य को यतना पूर्वक साहित्य संसार में अमर कर दें ।
    सस्नेह।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धैर्य बंधाने के लिए हार्दिक धन्यवाद कुसुम कोठारी जी 🙏

      Delete
  9. क्या समीक्षा करूँ समझ नहीं आ रहा शरद जी। फिर भी इतना कहूँगी आप धैर्य बनाए रखें 🙏

    ReplyDelete
    Replies
    1. धैर्य बंधाने के लिए हार्दिक धन्यवाद अनुराधा जी 🙏

      Delete