मंगलवार, नवंबर 07, 2017

मन एक पंछी .... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

मन एक पंछी
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मन
एक पंछी ही तो है
डोलता है, फुदकता है
हो जाता है उदास
सूखी डालियों पर
और खिल उठता है
किसी फूल की तरह
हरी पत्तियों के बीच
मन का मधुर स्वर
मन ही सुनता है
क्यों कि मन
वह पंछी नहीं
जो दिखे सबको, रिझाए सबको, मोहे सबको
मन एक पंछी है
निरा व्यक्तिगत
नितान्त अपना
किसी गोपन की तरह।
- डॉ शरद सिंह


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