सोमवार, नवंबर 27, 2017

स्वप्न की रजाई ... डॉ शरद सिंह

Winter ... Poetry of Dr Miss Sharad Singh
स्वप्न की रजाई
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जाड़े की रात ने
सांकल खटकाई
शीत भी दरारों से
सरक चली आई
पक्के मकानों में
उपले, न गोरसी
हीटर के तारों से
लाल तपन बरसी
नींद मगर चाहे
स्वप्न की रजाई
और
कम्बल के धागों में
प्रीत की कताई।
- डॉ शरद सिंह


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1 टिप्पणी:

  1. अभी तो जाड़े ने धीरे से सांकल खटकाई है
    बहुत सुन्दर सामयिक रचना

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