शुक्रवार, नवंबर 03, 2017

वह अपनापन .... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh
वह अपनापन
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मेरी स्मृतियों का वह गांव
मुझे पुकारता है प्रतिदिन
जहां -
लम्बी, पतली, कच्ची सड़क के
दोनों ओर थे ऊंचे-ऊंचे पुराने वृक्ष,
बिजली की प्रतीक्षा में खड़े
तारविहीन खम्बे,
कुछ खपैरली मकान,
मकानों में छोटी-छोटी खिड़कियां
मंझोले दरवाज़े
गोबर से लिपे आंगन
और
एक अहसास अपनेपन का ।

वह गांव आज भी वहीं हैं
आ गई है बिजली भी
लेकिन नहीं है तो वे सारे वृक्ष
सागौन की गंध से तर वह सोंधापन
और वह अपनापन
ये वो गांव नहीं जो मुझे बुलाता है
प्रतिदिन ।

- डॉ शरद सिंह

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