सोमवार, जुलाई 10, 2017

कितना मुश्क़िल है .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


कितना मुश्क़िल है
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एक नाम होंठों से फिसला
मगर तैर न सका हवा में
एक स्वप्न आंखों में उतरा
मगर ठहर न सका दृश्यों में
मैंने जाना ठीक उसी पल
कितना मुश्क़िल है
कर पाना अभिव्यक्त प्रेम को
किसी गली, सड़क या चौराहे पर
सच, कितना मुश्क़िल है
हो पाना मुखर ...
प्रेम का ... प्रेम से ... प्रेम के लिए ...



प्यार आता है मुझे ... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


प्यार आता है मुझे
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नींद प्यारी होती है
हमेशा नहीं
स्वप्न सुंदर होते हैं
हमेशा नहीं

फिर भी
कभी-कभी

जब मैं बना पाती हूं
रात के कैनवास पर
एक राह
फूलों वाली
सिर्फ़ तुम्हारे लिए
नींद और स्वप्न पर
प्यार आता है मुझे

- डॉ. शरद सिंह

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मंगलवार, जुलाई 04, 2017

कभी जीना इस तरह भी .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

कभी जीना इस तरह भी
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 पसंद रहा
तुम्हें सदियों तक
हाथ भर लंबा घूंघट वाला मेरा रूप
कभी सोचा-
कैसे सांस ली मैंने
कैसे तरसी हूं ताज़ा हवा को मैं
कैसे वंचित रही सुंदर दृश्यों से
कैसे किया है दमन अपनी मानवीय इच्छाओं का
कभी रह कर देखना तुम भी
किसी अंधेरे कमरे में
जंजीरों से बंध कर
कभी जीना इस तरह भी
शायद कर सको अनुभव मेरे
अतीत की घुटन को
शायद .....