रविवार, जून 18, 2017

पिता ... .... डॉ. शरद सिंह



पिता
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आयताकार फ्रेम
और काले मोटे काग़ज़ के एल्बम पर
चिपकी हुई
देखी है जो तस्वीर
वही तस्वीर देखी है अकसर
मां के आंसुओं में

नहीं है वह सिर्फ़ एक बेजान तस्वीर
वह तो हैं पिता मेरे
मां, दीदी और मेरी स्मृतियों में जीवित

मेरी नन्हीं मुट्ठी में गरमाती है
आज भी
उनकी मज़बूत उंगली
जो चाहती थी
मैं सीख जाऊं चलना, दौड़ना, उड़ना
और जूझना इस संसार से
यही तो चाहते हैं सभी पिता
शायद ....


- डॉ शरद सिंह

HappyFathersDay
 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. पिता को समर्पित शब्दों को नमन है ... बेहद भावपूर्ण ...

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