रविवार, जून 18, 2017

पिता ... .... डॉ. शरद सिंह



पिता
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आयताकार फ्रेम
और काले मोटे काग़ज़ के एल्बम पर
चिपकी हुई
देखी है जो तस्वीर
वही तस्वीर देखी है अकसर
मां के आंसुओं में

नहीं है वह सिर्फ़ एक बेजान तस्वीर
वह तो हैं पिता मेरे
मां, दीदी और मेरी स्मृतियों में जीवित

मेरी नन्हीं मुट्ठी में गरमाती है
आज भी
उनकी मज़बूत उंगली
जो चाहती थी
मैं सीख जाऊं चलना, दौड़ना, उड़ना
और जूझना इस संसार से
यही तो चाहते हैं सभी पिता
शायद ....


- डॉ शरद सिंह

HappyFathersDay
 
#SharadSingh #Poetry #MyPoetry
#मेरीकविताए_शरदसिंह #पिता #मां #दीदी #तस्वीर #एल्बम #संसार

गुरुवार, जून 15, 2017

पृथ्वी भी मेरी तरह .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


पृथ्वी भी मेरी तरह
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हां, मैं हूं नॉस्टैल्जिक
किन्तु बोहेमियन भी
अपनी सारी पीड़ाओं से बाहर घूमती
बगल में दबाए यादों की गठरी
क्योंकि संभव नहीं है फेंकना यादों को
यादें ही तो हैं जो मुझको
मिलाती रहती हैं मुझसे
किसी आईने की तरह
कि सजी थी मैं भी कभी
किसी के लिए
लगा कर माथे पर चांद
ओढ़कर किरणें
पृथ्वी की तरह
इसीलिए शायद
बोहेमियन है पृथ्वी भी मेरी तरह
और कुछ-कुछ
नॉस्टैल्जिक भी।


- डॉ. शरद सिंह

1- नॉस्टैल्जिक = यादों के सहारे जीने वाली
2- बोहेमियन = घुमन्तू 


#SharadSingh #Poetry #MyPoetry #मेरीकविताए_शरदसिंह #नॉस्टैल्जिक #बोहेमियन #पृथ्वी #यादों_की_गठरी #आईने #चांद

बुधवार, जून 14, 2017

कभी तो ठहरो ... डॉ. शरद सिंह


Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


कभी तो ठहरो
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कल तुम फिर छोड़ गए मुझे
रीती हुई चाय की प्याली की तरह
न भाप, न तरल
न उष्मा, न ऊर्जा
बेहिसाब थकन
मन की टूटन
बस, कुछ धब्बे तलछट में
एक धब्बा किनारे पर
होठों का
वही होंठ जिनसे कहा था तुमने
‘‘फिर मिलेंगे, जल्दी ही’’

कभी तो ठहरो,
भर जाने दो प्याली फिर से
और फिर से उठने दो
गर्म भाप विचारों की।

- डॉ. शरद सिंह

#SharadSingh #Poetry #MyPoetry
#मेरीकविताए_शरदसिंह #चाय #प्याली #तलछट #धब्बा #थकन

प्रेम ... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


प्रेम
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उसने
उसकी
कलाई को छुआ
और उसे पढ़ लिया
पूरा का पूरा

गुरुवार, जून 08, 2017

छपे हुए शब्द ... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


छपे हुए शब्द
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छपी हुई किताबें
नहीं हैं कम्प्यूटर
कि गिरने लगें उसके अक्षर
किसी वायरस के कारण

पीले पड़ने और टूटने के बाद भी
सहेजे रहते हैं पन्ने
किताबों की आत्मा को

जैसे मिस्र के रेगिस्तानों में खड़े पिरामिड
कच्छ के खारे पानी में डूबी द्वारका
या फिर
दिल के सबसे सुरक्षित कोने में
ठहरी किसी की याद

स्थाई रहते हैं छपे हुए शब्द
मन में बसी किसी अमिट स्मृति की तरह।

- डॉ शरद सिंह


#SharadSingh #Poetry #MyPoetry
#मेरीकविताए_शरदसिंह
#मिस्र #किताबें #द्वारका #दिल #आत्मा
#कम्प्यूटर #वायरस #याद #स्मृति

सोमवार, जून 05, 2017

विश्व पर्यावरण दिवस 2017 ... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

विश्व पर्यावरण दिवस 2017

 धरती के प्रति जागरूक हो
पर्यावरण बचाना है
नदी, ताल की रक्षा कर के
जीवन सजल बनाना है
नष्ट न हो पाए हरियाली
पौधा नया लगाना है
‘शरद’ स्वयं संकल्पित हो कर
सबको राह दिखाना है
- डॉ शरद सिंह

 Happy World Environment Day 2017

शनिवार, जून 03, 2017

संवाद करते पत्थर .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


संवाद करते पत्थर
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पत्थर बेजान नहीं होते
करते हैं संवाद
किसी विद्वान, ज्ञानी
किसी पोथी या भित्तिचित्र की तरह
या प्रेमी युगल की तरह
पत्थर भी सिखा सकते हैं
चौसठ कलाएं
और जीवन के
सारे रहस्य
हां,
यदि वे हों -
खजुराहो या कोणार्क मंदिरों के पत्थर....
सच मानो,
कला का स्पर्श पा कर
हो जाते हैं पत्थर भी प्राणवान ।

गुरुवार, जून 01, 2017

मौन भी संवाद है .... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


मौन भी संवाद है
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मौन भी संवाद है
यदि आंखों से
कहा और सुना जाए
प्रेम भी धड़कन है
यदि दिल से दिल को
छू लिया जाए
फिर मौन और प्रेम भी
बसा सकते हैं
कोलाहल भरी एक दुनिया
जिसमें अर्थ
शब्द का लिबास पहन का घूमते रहेंगे
उड़ती रहेंगी पंक्तियां की तितलियों की तरह
और मुखर होता रहेगा सन्नाटा
हथेली में रची मेंहदी
और मेंहदी में छिपाकर लिखे गए
नाम की तरह
क्यों कि मौन भी संवाद ही तो है।

सोमवार, मई 29, 2017

आओ और पूरा पढ़ो .... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


आओ और पूरा पढ़ो
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मेरी ज़िन्दगी की किताब के पन्ने
पढ़ने तो शुरू किए  तुमने
पर छोड़ दिए जल्दी ही
एक पन्ने का कोना मोड़ कर
फिर पढ़ने के लिए

क्या तुम्हें पता है?

पीला पड़ने लगा है काग़ज़
कठोर होने लगे हैं उसके रेशे
टूटने को आतुर है वह कोना मुड़े-मुड़े
फड़फड़ा रहे हैं शेष पन्ने
पढ़े जाने के लिए

अब तक यदि बदल गया हो
तुम्हारे चश्मे नंबर और नज़रिया भी
तो आओ और पूरा पढ़ो
क्योंकि किताबें अधूरी नहीं छोड़ी जातीं।

- डॉ. शरद सिंह

 #SharadSingh #Poetry #MyPoetry
#मेरीकविताए_शरदसिंह

मुझको मुझसे ही ... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

मंगलवार, मई 23, 2017

इकतारा ... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


इकतारा
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ध्वनियां
बहुत कुछ कहती हैं
कभी सार्थक, कभी निरर्थक
मौन पी जाता है सारी ध्वनियों को
छानता है धैर्य की छन्नी से
और अच्छी ध्वनियों को
उंडेल देता है इकतारे पर
तभी तो
इकतारा होता है झंकृत
किसी देह की तरह ...

- डॉ. शरद सिंह

#SharadSingh #Poetry #MyPoetry

अब तो चाहिए... डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

अब तो चाहिए...
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बहुत थकान होती है -
उधार के रिश्तों को जीते हुए
जैसे ओढ़ी हुई मुस्कान
थका देती है होंठों को
गालों को
और आंखों की कोरों को
हां,
बहुत थकान होती है -
जब रिश्तों को जीते हैं
रिश्तों के बिना
जीत की उम्मींद में
फेंके हुए पासों की तरह।

और थक-हार कर
अकसर सोचता है मन
ये ज़िन्दगी थकी-थकी सी है
अनुबंधों के लिबास तले
ओह, अब तो चाहिए एक सुई या पिन
जिससे उधेड़ा जा सके
इस लिबास की सीवन को।
.... - डॉ. शरद सिंह

#SharadSingh #Poetry #MyPoetry

गुरुवार, मई 18, 2017

मैं ग़ज़ल की एक किताब हूं ... - डॉ शरद सिंह

लम्बी बहर का एक शेर मेरे ग़ज़ल संग्रह ‘‘पतझड़ में भीग रही लड़की’’ से ....
Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

Few lines (a Sher) from my Ghazal collection (poetry book) "Patajhar men bheeg rahi ladaki" ....

गुरुवार, मई 11, 2017

कोशिश करते तो सही .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

कोशिश करते तो सही ....
                    - डॉ. शरद सिंह


तुम रखते मेरी हथेली पर
एक श्वेत पुष्प
और वह बदल जाता
मुट्ठी भर भात में
तुम रखते मेरे कंधे पर अपनी उंगलियां
और हो जाती सुरक्षित मेरी देह
तुम बोलते मेरे कानों में कोई एक शब्द
और बज उठता अनेक ध्वनियों वाला तार-वाद्य

सच मानो,
मिट जाती आदिम दूरियां
भूख और भोजन की
देह और आवरण की
चाहत और स्वप्न की

बस,
तुम कोशिश करते तो सही।
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#SharadSingh #Poetry #MyPoetry #Koshish #Try

शुक्रवार, मई 05, 2017

अंदर की आवाज़ .. .- डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

अंदर की आवाज़
             - डॉ शरद सिंह
एक दिन
जब मन की कोमल, महीन ध्वनियां
बदल जाती हैं अनहद नाद में
सोई हुई शिराओं में जाग उठती हैं #ऋचाएं
कंठ हो जाता है सामवेदी
गाने लगता है #प्रयाण-गीत
शब्द फूंकने लगते हैं दुंदुभी
और भुजाएं व्याकुल हो उठती हैं समुद्र-मंथन को
.... और सब कुछ बदल जाता है उसी पल
किसी सुप्त #ज्वालामुखी के फूट पड़ने जैसा
ठीक उसी समय पता चलता है अंदर की आवाज़ का
वह आवाज़ जो गढ़ती है एक नए #इंसान को पुराने इंसान के भीतर

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#InnerVoice #SharadSingh #Poetry #MyPoetry

गुरुवार, मई 04, 2017

और मैं देखती रहूंगी....- डॉ शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

और मैं देखती रहूंगी....

मिलोगे तुम मुझे
एक अरसे बाद
यूं ही अचानक
किसी कॉन्फ्रेंस में, सेमिनार में
या किसी मेट्रो में
बेशक़ सोचा था मैंने!


नहीं सोचा था तो ये...

कि मिलोगे तुम किसी चाय-पार्टी में
मेरी पुरानी सहेली के नए हमसफ़र बन कर
और मैं देखती रहूंगी मूक-दर्शक की तरह
अपने अतीत के पन्नों को फाड़ती हुई ...


- डॉ. शरद सिंह

#MyPoetry
#Miss_Sharad_Singh

शनिवार, अप्रैल 29, 2017

उदास रहने की आदत मुझे न हो जाए ...- डॉ शरद सिंह

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh
 
खुशी का एक भी लम्हा कहीं न खो जाए
उदास रहने की आदत मुझे न हो जाए
बला की धूप है ख़्वाबों में तो नहीं शिक़वा
ये ग़म की छांह कहीं और जा के सो जाए ... - डॉ शरद सिंह


#Shayari #SharadSingh
#धूप #ख़्वाबों #शिक़वा #लम्हा #उदास #खुशी #आदत

मंगलवार, अप्रैल 25, 2017

जो नहीं है वही लुभाएगा ... - डॉ शरद सिंह

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

एक तारा था छुप गया है कहीं
रात होने पे नज़र आएगा
ज़िन्दगी में है ये अनूठापन
जो नहीं है वही लुभाएगा ... - डॉ शरद सिंह


सोमवार, अप्रैल 24, 2017

ज़िन्दगी भी अज़ब पहेली है ... - डॉ शरद सिंह

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh
सांस दुश्मन है या सहेली है
ज़िन्दगी भी अज़ब पहेली है।
मौत आती है साथ पाने को
यूं तो रहती सदा अकेली है। - डॉ शरद सिंह


गुरुवार, अप्रैल 20, 2017

तप रहे हैं दिन ...- डॉ शरद सिंह

Dr (Ms) Sharad Singh

धूप का मिजाज़ कुछ ज़्यादा गर्म है ...इसी बात पर ये पंक्तियां...
 


 तप रहे हैं दिन अलावों की तरह
ज़िन्दगी लगती सवालों की तरह
टीसते हैं रोज़ मन में प्रश्न कुछ
पांव में चुभते-से छालों की तरह
- डॉ शरद सिंह

#Shayari #SharadSingh

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

बुधवार, अप्रैल 12, 2017

यादों से भरा हुआ ... - डॉ शरद सिंह

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

#यादों से भरा हुआ ...
#Poetry #SharadSingh #कविता

यादों का पहरा है ... - डॉ शरद सिंह

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh
खुशियों के  दरवाज़े   यादों का पहरा है
मुस्काना मुश्क़िल है   दर्द बहुत गहरा है
कहते हैं लोग सभी ग़म भी मिट जाते हैं
मुमकिन ये कैसे हो   वक़्त लगे ठहरा है
- डॉ शरद सिंह


गुरुवार, अप्रैल 06, 2017

पतझड़ में भीग रही लड़की ....

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

(मेरे ग़ज़ल संग्रह 'पतझर में भीग रही लड़की’ से )
पतझड़  में  भीग रही लड़की।
मौसम  को  जीत रही लड़की।

रहते दिन  कभी  नहीं एक से
अनुभव  से  सीख रही लड़की।

शिखरों तक जा पहुंची आज तो
कल तक जो  दीन रही लड़की।

पढ़ती  है  धूप  की   क़िताबें
रातों  की  मीत  रही  लड़की।

मुट्ठी  में  होगी  कल दुनिया
सपनों  को  बीन  रही लड़की।

मांगे  से   मिले  कब  उजाले
अपना  हक़  छीन  रही लड़की।

चाहत का  द्वार ‘शरद’, देख लो
आशा  से  लीप   रही लड़की।

   - डॉ शरद सिंह
 
#Shayari #SharadSingh

सोमवार, अप्रैल 03, 2017

ऐसा लगता है ...

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

सूखी पत्ती  पैरों में दब  कुछ न कुछ तो  बोलेगी
दबी ज़िन्दगी का  हर पहलू   धीरे -धीरे खोलेगी
इतनी ज़्यादा दुखी दिखाई देती है, चिट्ठी पढ़ कर
ऐसा लगता है वह जा कर तक़िया अभी भिगो लेगी
- डॉ शरद सिंह
#Shayari #SharadSingh

शनिवार, अप्रैल 01, 2017

असर लाया तो है कुछ-कुछ ...

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh
चलो, अच्छा हुआ उसको समझ आया तो है कुछ-कुछ
मेरी #ग़ज़लें, मेरा #लहज़ा उसे भाया तो है कुछ-कुछ
बड़ी ही #बेरुखी से वो मिला करता था पहले तो
मगर शायद #दुआओं ने असर लाया तो है #कुछ_कुछ
- डॉ. शरद सिंह


#Shayari #SharadSingh

गुरुवार, मार्च 30, 2017

बंद खिड़कियां ....

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

जाने   कितने   राज़   छिपाये   रहती हैं
बंद खिड़कियां फिर भी कुछ तो कहती हैं
कुछ झगड़े, कुछ मीठी बातें   झिरियों से
यादों  की  धारायें   बन   कर  बहती हैं
- डॉ. शरद सिंह 

 (*झिरियों = दरारों)

#Shayari #SharadSingh

गुरुवार, मार्च 23, 2017

साथ मेरे रह रहा है ...

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh
मेरी अांखों को जाने ख़्वाब कैसा दिख रहा है
सुलगती रेत में  भी  एक  दरिया  बह रहा है
परिंदे  उड़ रहे  हैं  तोड़ कर  पिंजरों के ताले
वो  मुझसे  दूर  हो कर  साथ मेरे रह रहा है
- डॉ शरद सिंह


मंगलवार, मार्च 21, 2017

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh on World Poetry Day 2017

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh on World Poetry Day 2017

On #WorldPoetryDay #विश्व_कविता_दिवस ....

कविता
मात्रा शब्दों का समूह नहीं
भावना है, आत्मा है, अनुभव है
और प्रवाह है स्पर्श का -
एक संवेदना से दूसरी तक !

            - डॉ. शरद सिंह 

poem
is not only a group of words
Is the feeling, the soul, the experience
And is the flow of touch -
From one sensation to another!

                          - Dr (Miss) Sharad Singh

विश्व कविता दिवस 2017 ... डॉ. शरद सिंह की पांच कविताएं

Happy #WorldPoetryDay #विश्व_कविता_दिवस 2017 को दैनिक 'आचरण' (सागर) में शब्द पर केन्द्रित प्रकाशित मेरी पांच कविताएं ... 💐हार्दिक आभार "दैनिक आचरण" !!! 
Vishwa Kavita Diwas 2017, Aacharan, Sagar Edition ... Five Poems of Dr (Miss) Sharad Singh


तृप्ति क्या है? प्यास क्या है?


धूप,  तारे,  रेत,  मिट्टी,  शेष  गाथा  बोल देंगे
तृप्ति क्या है? प्यास क्या है? राज़ सारा खोल देंगे
ज़िन्दगी ने बांध कर अनुबंध में बोला ‘शरद’ से
नाट्य  ‘ओथेलो’  करेंगे,  नायिका का  रोल देंगे
- डॉ शरद सिंह


(मेरे ग़ज़ल संग्रह 'पतझर में भीग रही लड़की’ से ... * ‘ओथेलो’ शेक्सपियर का सुप्रसिद्ध नाटक जिसमें नायिका पर बेवज़ह शक़ किया जाता है और उसी बेबुनियाद शक़ के कारण उसे मार दिया जाता है।)

#Shayari #SharadSingh

बुधवार, मार्च 15, 2017

इस बार होली पर यादें ... सिर्फ़ यादें ....

Dr Varsha Singh & Dr Sharad Singh with uncle Late Kamal Singh Chauhan in their childhood
इस वर्ष मेरी होली बेरंग थी क्योंकि मेरे प्यारे कमल सिंह मामा जी मेरे साथ नहीं थे ...
इस तस्वीर में - मैं अपने कमल सिंह मामा जी की गोद में हूं और साथ खड़ी हैं मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह।

March, 2017
 

This year my HOLI was colorless because my loving Uncle had not with me...
In this pic - I am in my uncle's lap & my Didi Dr Varsha Singh stands beside.


I miss U Kamal Mama !!! 

May your soul rest in peace !!!

गुरुवार, मार्च 02, 2017

बुधवार, मार्च 01, 2017

चला आए यूं आंखों में ...

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

कोई दस्तक, कोई आहट, चमक लाए यूं आंखों में
हक़ीकत बन के इक सपना चला आए यूं आंखों में
- डॉ शरद सिंह

#Shayari #SharadSingh

शनिवार, फ़रवरी 25, 2017

दिल की पाठशाला में ...

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

मैं लैला या कि शीरीं या कि तेरी हीर हो जाऊं
मगर तू भी तो मजनूं, राझणां, फरहाद हो जाए
जो मैंने पढ़ लिया है पाठ, दिल की पाठशाला में
वो पूरा पाठ तुझको भी तो इक दिन याद हो जाए
- डॉ शरद सिंह
#Shayari #SharadSingh

गुरुवार, फ़रवरी 23, 2017

कभी पास आ के तो देखते ...

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

मेरा साथ दे के तो देखते
मुझे आजमा के तो देखते
मेरी आंख में तेरे अश्क़ थे
कभी पास आ के तो देखते
- डॉ शरद सिंह


#Shayari #SharadSingh

मंगलवार, फ़रवरी 21, 2017

हर ख़्वाब हो सच अपना ...

Shayari of Dr (Miss) Sharad Singh

तस्वीर को   रंगों से,   आंचल   पे  उतारा है
हर ख़्वाब हो सच अपना, ये ख़्वाब हमारा है
तुम खोल के दरवाज़ा,  दस्तक को उठा लेना
माहौल  बदलने   को   मौसम ने   पुकारा है
- डॉ शरद सिंह

 
#Shayari #SharadSingh

सोमवार, फ़रवरी 20, 2017

लेखिका शरद सिंह का व्यक्तित्व एवं कृतित्व



डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

                                            
        आधुनिक हिन्दी कथा लेखन के क्षेत्र में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपने पहले उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ से हिन्दी साहित्य जगत में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज़ कराई। परमानद श्रीवास्तव जैसे समीक्षकों ने उनके इस उपन्यास को हिन्दी उपन्यास शैली का ‘‘टर्निंग प्वाइंट’’ कहा है। यह हिन्दी में रिपोर्ताजिक शैली का ऐसा पहला मौलिक उपन्यास है जिसमें आंकड़ों और इतिहास के संतुलिक समावेश के माध्यम से कल्पना की अपेक्षा यथार्थ को अधिक स्थान दिया गया है। यही कारण है कि यह उपन्यास हिन्दी के ‘‘फिक्शन उपन्यासों’’ के बीच न केवल अपनी अलग पहचान बनाता है अपितु शैलीगत एक नया मार्ग भी प्रशस्त करता है। ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ के बाद रिपोर्ताज़ शैली के कई उपन्यास हिन्दी में आए किन्तु उस तरह का जोखिम किसी में भी अब तक दिखाई नहीं दिया है जैसा कि शैलीगत जोखिम ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ में उठाया गया था। शरद सिंह जहां एक ओर नए कथानकों को अपने उपन्यासों एवं कहानियों का विषय बनाती हैं वहीं उनके कथा साहित्य में धारदार स्त्रीविमर्श दिखाई देता है। शरद सिंह के तीनों उपन्यासों ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’, ‘‘ पचकौड़ी’’ और कस्बाई सिमोन’’ के कथानकों में परस्पर भिन्नता के साथ ही इनमें शैलीगत् भिन्नता भी है। ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ में वे जहां बेड़िया समाज की स्त्रियों के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालती हैं, वहीं पचकौड़ी में बुन्देलखण्ड के सामंतवादी परिवेश में स्त्रीजीवन की दशा का चित्रण करते हुए वर्तमान सामाज, राजनीति एवं पत्रकारिता पर भी गहरा विमर्श करती हैं। ‘‘कस्बाई सिमोन’’ में वे एक अलग ही विषय उठाती हुई ‘‘लिव इन रिलेशन’’ को अपने उपन्यास का आधार बनाती हैं। इसी प्रकार उनकी प्रत्येक कहानियों के कथानक एक नए प्रसंग एवं परिस्थिति से साक्षात्कार कराते हैं।

अपने कथालेखन के विषयों के संदर्भ में स्वयं शरद सिंह का मानना है कि ‘‘मेरे कथानक समाज और आम स्त्रियों के जीवन से उठ कर आते हैं।’’



व्यक्तित्व :

व्यवहार में सरल, सहज, मिलनसार एवं आकर्षक व्यक्तित्व की धनी लेखिका शरद सिंह का जन्म मध्यप्रदेश के एक छोटे से जिले पन्ना में 29 नवम्बर 1963 को हुआ था। जब वे साल भर की थीं तभी उनके सिर से उनके पिता श्री रामधारी सिंह का साया उठ गया। उनका तथा उनकी बड़ी बहन वर्षा सिंह का पालन-पोषण उनकी मां विद्यावती सिंह क्षत्रिय ने किया। उनकी विधवा मां को अपने ससुराल पक्ष से कोई सहारा न मिलने के कारण अपने पिता संत श्यामचरण सिंह के घर रहना पड़ा। शरद सिंह जी के नाना संत श्यामचरण सिंह शिक्षक होने के साथ ही गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। तत्कालीन मध्यभारत (वर्तमान वर्धा एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्र) में उन्होंने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए नशाबंदी के लिए अभियान चलाए। वे बालिका शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। इसीलिए उन्होंने अपने पुत्र कमल सिंह के साथ ही पुत्री विद्यावती सिंह को भी पढ़ने-लिखने के लिए सदैव प्रोत्साहित किया। उदारमना संत श्यामचरण सिंह ने उज्जैन स्थित अपना घर बेच कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सहायता की। इससे उन्हें समाज में तो सम्मान मिला किन्तु आर्थिक स्थिति डावांडोल हो गई। तब पुत्री विद्यावती सिंह ने नौकरी करने का निर्णय किया और शीघ्र ही वे शिक्षका बन गईं। उन्होंने अपने छोटे भाई कमल सिंह की पढ़ाई का जिम्मा भी अपने ऊपर ले लिया। घर की आर्थिक स्थिति सम्हल गई। किन्तु नियति ने कुछ और ही विधान रच रखा था। विद्यावती सिंह का देवरिया (उत्तर प्रदेश) निवासी रामधारी सिंह से विवाह हुआ। वे एक के बाद एक तीन पुत्रियों की मां बनीं। जिनमें मंझली पुत्री जन्म लेने के कुछ माह बाद ही चल बसी। उनके ससुराल पक्ष को पुत्रियों का जन्म नहीं भाया और उनका व्यवहार कटु होता चला गया। इस बीच विद्यावती सिंह शिक्षण कार्य भी करती रहीं। जब वे अपने पिता के घर पर थीं तभी एक दिन अचानक अपने पति रामधारी सिंह की मुत्यृ की सूचना मिली। इसके बाद मानो उनका जीवन ही बदल गया। ससुराल पक्ष के मुंहमोड़ लेने के बाद उन्होंने तय किया कि वे किसी भी परिवारजन से एक पैसा भी लिए बिना अपनी दोनों पुत्रियों का लालन-पालन करेंगी। मां की यही दृढ़ता उनकी दोनों पुत्रियों में भी आई।

शरद सिंह की मां विद्यावती सिंह अपने समय की ख्यातिलब्ध लेखिका एवं कवयित्री रही हैं। वे विद्यावती ‘‘मालविका’’ के नाम से साहित्य सृजन करती रही हैं। ‘‘हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय पर लिखे गए शोधात्मक गं्रथ पर विद्यावती जी को जहां आगरा विश्वविद्यालय ने पीएच. डी. की उपाधि प्रदान की वहीं इस ग्रंथ ने उन्हें हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय प्रतिष्ठा दिलाई। यह कहा जा सकता है कि साहित्य सृजन का गुण शरद सिंह को अपनी मां एवं बहन डॉ. वर्षा सिंह से विरासत में मिला। डॉ. वर्षा सिंह हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। उनके पांच ग़ज़ल संग्रह एवं ग़ज़ल विधा पर एक शोधात्मक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है।

शरद सिंह जी अपने नामकरण के संबंध में बताती हैं कि जब उनकी मां को प्रसव के उपरांत यह बताया गया कि उन्होंने पुत्री को जन्म दिया है तो उनकी मां के मुख से यही निकला-‘‘वर्षा विगत शरद ऋतु आई। मेरी बड़ी बेटी का नाम वर्षा रखा गया है और अब छोटी का नाम शरद रखूंगी।’’ यद्यपि बाद में परिवार के कुछ लोगों ने मां को समझाना चाहा कि यह ‘‘लड़कों वाला नाम’’ है किन्तु मां को यही नाम भा गया था और वे अपनी बेटी को यही नाम देना चाहती थीं। तब शरद जी के नाना संत श्यामचरण सिंह ने हस्तक्षेप किया और तय हुआ कि ‘‘शरद कुमारी सिंह’’ नाम रखा जाएगा। लेकिन वास्तव में इस नाम का प्रयोग कभी किया ही नहीं गया और जन्मपत्री से लेकर विद्यालय में दाखिले के समय भी ‘‘शरद सिंह’’ नाम ही रखा गया।

शरद सिंह जी की आरम्भिक स्कूली शिक्षा पन्ना में महिला समिति द्वारा संचालित शिशुमंदिर विद्यालय में हुई। इसके बाद शासकीय मनहर कन्या उच्चतर माध्यमिक वि़द्यालय, पन्ना में दसवीं कक्षा तक अध्ययन किया। इस बीच उनके नाना संत श्यामचरण सिंह का निधन हो गया। उन्हें अपने नाना से बेहद लगाव था। उनकी मनोदशा देखते हुए मां ने उन्हें मामा कमल सिंह के पास पढ़ने भेज दिया। इस प्रकार शरद सिंह जी ने शहडोल जिले के छोटे से कस्बे बिजुरी जो मुख्यरूप से कोयला उत्पादक क्षेत्र था, में अपने मामा जी के पास रहते हुए ग्यारहवीं बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण की। वे अपनी पढ़ाई के बारे में बताती हैं कि ‘‘मेरी दीदी वर्षा सिंह बायोलॉजी की छात्रा रहीं, इसलिए मुझे भी विज्ञान विषय अच्छा लगता था। या यूं कहूं कि उनकी देखा-देखी मैंने भी आर्ट और साईंस में से साईंस को चुना। मगर ग्यारहवीं में कुछ ऐसे अनुभव हुए जिन्होंने मुझे विज्ञान विषय छोड़ने पर मजबूर कर दिया। एक अनुभव तो ट्यूशन को ले कर था। हमारे स्कूल के केमिस्ट्री के शिक्षक प्रत्येक छात्र को विवश करते थे कि विद्यालयीन समय के बाद सब उनसे ट्यूशन पढ़ा करें। ट्यूशन न पढ़ने पर वे फेल करने की धमकी दिया करते थे। मुझे स्वाध्याय की आदत थी इसलिए मैंने ट्यूशन ज्वाइन नहीं किया। मामा जी के कारण वे मुझे प्रैक्टिकल में फेल तो नहीं कर सके लेकिन साईंस टीचर्स की इस लोलुपता ने मुझे उनके प्रति विमुख कर दिया। दूसरी घटना जूलॉजी के प्रैक्टिकल के समय की है। हमारे जूलॉजी के शिक्षक ट्यूशनखोर नहीं थे वे एक अच्छे शिक्षक थे। लेकिन मुझे अपने जीवन में जब पहली बार मेंढक का डिसेक्शन करना पड़ा और एक गलत नस कट जाने के कारण पूरी डिसेक्शन-ट्रे खून से भर गई तो मेरे हाथ-पैर कांपने लगे। तब मुझे पहली बार अनुभव हुआ कि मैं रक्तरंजित दृश्य नहीं देख सकती हूं। उस दिन मुझे अपने शिक्षक के कहने पर उस कटे हुए मृत मेंढक की टांगें पकड़नी पड़ीं। जिसके कारण दो दिन तक मुझसे खाना नहीं खाया गया। तभी मैंने तय कर लिया था कि हायर सेकेंड्री के बाद मैं साईंस विषय छोड़ कर आर्ट में दाखिला ले लूंंगी।’’

उस समय दस धन दो प्रणाली लागू नहीं थी अतः विद्यालय के बाद की शिक्षा के लिए वे वापस पन्ना अपनी मां के पास आ गईं। जहां उन्होंने शासकीय छत्रसाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय में बी. ए. प्रथम वर्ष में दाखिला लिया। उनके विषय थे- हिन्दी विशिष्ट, अर्थशास्त्र और इतिहास। अपने महाविद्यालय में वे एक कुशाग्रबुद्धि की छात्रा के रूप में जानी जाती थीं। साहित्यिक गतिविधियों के साथ ही वे खेलकूद में भी आगे थीं। अपने महाविद्यालयीन जीवन में उन्होंने कैरम, टेबलटेंनिस तथा बैडमिंटन में छात्रावर्ग की ट्राफियां जीतीं। उन्होंने बी.ए. तृतीय वर्ष की पढ़ाई मध्यप्रदेश के ही दमोह नगर के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय से की। उस दौरान उन्होंने अपने महाविद्यालय की पत्रिका का आमुख भी डिज़ाइन किया। उन्हें बी.ए. की उपाधि सागर विश्वविद्यालय से प्राप्त हुई। इसके बाद परिवार में चल रहे उतार-चढ़ावों के कारण उन्होंने स्वाध्यायी छात्रा के रूप में अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय से मध्यकालीन भारतीय इतिहास विषय में पहला एम. ए. किया। इस दौरन वे पत्रकारिता से जुड़ चुकी थीं।              

शरद जी की मां विद्यावती मालविकासन् 1988 में सेवानिवृत्ति के बाद संभागीय मुख्यालय सागर में जा बसीं। उस समय तक उनकी बड़ी बहन वर्षा जी मध्यप्रदेश वि़द्युत मंडल में नौकरी करने लगी थीं। उन्होंने भी अपना स्थानांतरण सागर करा लिया। इस प्रकार सन् 1988 से शरद सिंह जी का स्थाई निवास सागर हो गया। सागर में उनका परिचय विख्यात पुरातत्वविद् प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी से हुआ। शरद जी ने उन्हें अपने वे प्रकाशित लेख दिखाए जो उन्होंने इतिहास एवं पुरास्थलों पर लिखे थे। शरद जी की रुचि देखते हुए प्रो. बाजपेयी ने उन्हें प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व में एम.ए. करने की सलाह दी। शरद जी को सलाह बहुत भाई और उन्होंने दूसरा एम.ए. प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विषय में मेरिट में प्रथम स्थान पाते हुए किया। इसके लिए उन्हें स्वर्णपदक से भी सम्मानित किया गया।

शरद जी की अध्ययनयात्रा अन्य विद्यार्थियों की भांति आसान नहीं रही। प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व में एम.ए. प्रथम वर्ष की परीक्षा प्रथम श्रेणी के अंकों से उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने द्वितीय वर्ष की तैयारी शुरू कर दी किन्तु इस बीच बी. एड. के रिक्रूटमेंट टेस्ट में वे चुन ली गईं और सभी ने उन्हें बाध्य किया कि जब वे पहले से ही एक एम.ए. कर चुकी हैं तो बी. एड. के इस व्यावयायिक अध्ययन के अवसर को उन्हें नहीं छोड़ना चाहिए। अंततः उन्होंने भी बी. एड. करना स्वीकार कर लिया और इस एक वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रौढ़शिक्षा विषय में ‘‘डिस्टिंक्शन’’ हासिल करते हुए प्रथम श्रेणी मेरिट में स्थान पाया। इसके बाद उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विषय की अपनी अधूरी पढ़ाई को पूरा करने के लिए एम.ए. द्वितीय वर्ष की स्वाध्यायी छात्रा के रूप में परीक्षा दी। उन्होंने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (पूर्व सागर विश्वविद्यालय) में मेरिट में प्रथम स्थान पाते हुए एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की और स्वर्णपदकभी प्राप्त किया। 
   अपने संस्मरणात्मक-लेख ‘‘डॉ. विवेकदत्त झा : जिनके शब्द कभी भुलाए नहीं जा सकते’’ में डॉ शरद सिंह ने अपनी पीएच. डी. के संबंध में अपने अनुभवों को इन शब्दों में लिखा है- ‘‘डॉ. विवेकदत्त झा से मेरा परिचय विख्यात इतिहासविद् प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी ने कराया था। सन् 1988 में जब मैंने सागर में निवास आरम्भ किया तब मुझे प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी से प्राचीन भारतीय इतिहास पर चर्चा-परिचर्चा का सुअवसर प्राप्त हुआ। उस समय वे पद्माकर नगर के अपने आवास में रहने आ चुके थे। मैंने अकसर अपनी मां डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ या फिर अपनी बड़ी बहन डॉ. वर्षा सिंह के साथ उनसे मिलने जाया करती थी। मैंने उन्हें अपने वे प्रकाशित लेख दिखाए जो मैंने नचना, अजयगढ़, कालंजर आदि बुंदेलखण्ड और विशेष रूप से पन्ना ज़िले के इतिहास एवं पुरास्थलों पर लिखे थे। उस समय मैं अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय से मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एम. ए. कर चुकी थी। लेकिन प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरास्थलों के प्रति मेरी रुचि देखते हुए प्रो. बाजपेयी ने मुझे प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व में एम.ए. करने की सलाह दी। मुझे उनकी सलाह बहुत भाई और मैंने स्वाध्यायी छात्रा के रूप में दूसरा एम.ए. प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विषय में मेरिट में प्रथम स्थान पाते हुए किया। इसके लिए मुझे विश्वविद्यालय की ओर से स्वर्णपदक से भी सम्मानित किया गया। एम. ए. करने के दौरान डॉ. विवेकदत्त झा से मेरा परिचय हुआ। पुरास्थलों के प्रति उनका रुझान एवं बस्तर ़क्षेत्र में की गई उनकी खोजों ने मुझे अत्यंत प्रभावित किया। इसीलिए जब कुछ समय बाद मैंने डॉक्टरेट करने का निर्णय लिया तो मुझे गाईड के रूप में सबसे पहला स्मरण डॉ. विवेकदत्त झा का ही आया। तब तक प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी का निधन हो चुका था और उनके बाद डॉ. विवेकदत्त झा ही थे जिनके मार्ग निर्देशन में मैं अपना शोधकार्य करना चाहती थी।
     सन् 1998 में मैं डॉ. विवेकदत्त झा से मिली और उनसे गाईड बनने का अनुरोध किया। वे सहर्ष मान गए। उन्होंने मुझसे शोध क्षेत्र संबंधी मेरी रुचि की जानकारी ली और मुझे ‘‘छतरपुर जनपद की मूर्ति कला का अध्ययन’’ विषय में शोधकार्य करने की सलाह दी। छतरपुर जिले के अंतर्गत् खजुराहो भी आता था जो मेरी रुचि का केन्द्रबिन्दु था। मैंने उत्साहपूर्वक अपना कार्य आरम्भ कर दिया। डॉ. झा के निर्देशानुसार छतरपुर ज़िले में उपलब्ध मूर्तियों को क्लासीफाई करते हुए शैव प्रतिमाओं से अपना कार्य आरम्भ किया। डॉ. झा बहुत तार्किक ढंग से अपनी बात कहते थे, चाहे वह किसी का हौसला बझ़ाने की ही बात क्यों न हो। मैंने अन्य छात्रों के संबंध में तो उनकी यह खूबी देखी ही थी, साथ ही मुझे स्वयं भी इसका अनुभव हुआ। हुआ यूं कि जब मैंने अपना आधार-कार्य डॉ. झा को नोट्स के रूप में दिखाया तो वे मुझे प्रोत्साहित करते हुए बोले -‘‘शिव कल्याणकारी होते हैं, आपने उन्हीं से अपना कार्य आरम्भ किया है, बहुत बढ़िया।’’
मैंने 24 महीने के न्यूनतम समय में अपना कार्य पूर्ण कर लेना चाहती थी। संयोगवश उन्हीं दिनों डॉ. झा को विश्ववि़द्यालय के ब्याज़ हॉस्टल्स का इंचार्ज बना दिया गया। जिससे उनकी व्यस्तता इतनी अधिक बढ़ गई कि मैंने अपने शोधकार्य की जांच करवाने उनके पास विभाग में पहुंचती तो वे छात्रों से घिरे पाए जाते। आए दिन कोई न कोई उलझन छात्रों के आगे आ जाती और वे उसे ले कर डॉ. झा के सम्मुख जा खड़े होते। उन दिनों मोबाईल तो थे नहीं कि मैंने उनसे उनकी तात्कालिक व्यस्तता का पता लगा कर विभाग जाने, न जाने का निर्णय लेती।
दो-तीन बार यह स्थिति आई कि मुझे अपना शोधकार्य जंचवाए बिना ही विभाग से वापस लौटना पड़ा। मुझे लगा कि इस तरह तो मैं 24 महीने की समय सीमा में अपना कार्य पूरा नहीं कर सकूंगी। अंततः एक दिन मैंने डॉ. झा से मैंने स्पष्ट शब्दों में पूछा-‘‘सर, यदि आपकी व्यस्तता इसी तरह चलती रही तो मैं निर्धारित समय में अपनी पीएच.डी. कभी पूरी नहीं कर सकूंगी। अब बताइए कि मैं क्या करूं?’’
डॉ. झा मेरी हताशा और झुंझलाहट भांप गए और वे सहज भाव से मुस्कुराते हुए बोले,‘‘मैं भी आपसे इस बारे में चर्चा करना चाह रहा था। मैं तो यहां के झमेले में इतना उलझ गया हूं कि मैं किसी भी तरह का आश्वासन देने की स्थिति में नहीं हूं। एक छात्र का मामला सुलझ नहीं पाता है कि दूसरा सामने आ खड़ा होता है। अब ये बच्चे जो अपने घर से दूर रह रहे हैं, मुझ पर भरोसा कर के मेरे पास दौड़े-दौड़े आते हैं तो मेरा भी दायित्व बन जाता है कि मैंने इनकी समस्याओं को सुलझाऊं। लेकिन इन सब चक्कर में आपकी समस्या बढ़ती जा रही है। मैं जानता हूं कि आप न्यूनतम समय सीमा में अपना शोधकार्य पूरा कर लेना चाहती हैं। मुझे विश्वास है कि आप पूरा कर भी सकती हैं और इसीलिए मेरी आपको सलाह है कि यदि आप जल्दी अपना कार्य समाप्त करना चाहती हैं तो अपना गाईड बदल लें।’’
मैंने उनकी बात सुर कर अवाक रह गई। मेरे गाईड स्वयं मुझसे कह रहे थे कि मैं उनके स्थान पर कोई और गाईड चुन लूं? कहीं डॉ. झा मुझसे नाराज़ तो नहीं हो गए? 
‘‘सर, आप ये क्या कह रहे हैं?’’ मुझे लगा कि उन्होंने मेरी बात का बुरा मान गए है।
‘‘अरे, घबराइए नहीं! मैंने बहुत प्रैक्टिकल बात कर रहा हूं। मुझे आपकी कार्यक्षमता और लेखन पर पूरा भरोसा है। आप जब चाहे मुझसे सलाह ले सकती हैं। बस, ऑफीशयली आप ऐसे सिंसियर गाईड के अंडर में काम करिए जो सब झमेलों से दूर रहता हो।’’ डॉ. झा ने मुझे तसल्ली देते हुए कहा।
‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकती हूं।’’ मैंने कहा।
‘‘आपको यही करना चाहिए, मैं भी नहीं चाहता हूं कि आपके कार्य में अनावश्यक विलम्ब हो और वह भी मेरे कारण। मुझे इससे दुख होगा।’’ डॉ. झा ने मुझे समझाते हुए कहा।
‘‘तो फिर आप ही सुझाइए कि मुझे किसके अंडर में काम करना चाहिए?’’ मैंने उन्हीं से पूछा। तब उन्होंने प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी के सुपुत्र डॉ. एस. के. बाजपेयी का नाम सुझाया और साथ में यह भी कहा कि, ‘‘आप चिन्ता न करें, मैं उनसे इस बारे में बात कर लूंगा।’’
उन्होंने जैसा कहा था, वैसा ही किया। उन्होंने डॉ. एस. के. बाजपेयी से मेरे बारे में चर्चा की और वे मेरे गाईड बनने को सहर्ष तैयार हो गए। चूंकि उस समय तक मेरी आर.डी.सी. नहीं हुई थी अतः मैंने अपना विषय बदलने का निर्णय लिया जिसके लिए डॉ. बाजपेयी भी मान गए। इसके बाद मैंने ‘‘खजुराहो की मूर्तिकला का सौंदर्यात्मक अध्ययन’’ विषय में डॉ. एस.के. बाजपेयी के मार्ग निर्देशन में अपना शोधकार्य निर्धारित समय सीमा यानी 24 माह में पूर्ण कर लिया। जैसा कि डॉ. विवेकदत्त झा ने डॉ. बाजपेयी के बारे में कहा था, वे ठीक वैसे ही ‘‘सिंसियर गाईड’’ निकले। बेशक़ मैंने डॉ. विवेकदत्त झा के आधीन शोधकार्य नहीं किया लेकिन जब भी मुझे किसी सलाह की आवश्यकता पड़ी तो बेझिझक मैंने उनसे सलाह ली और उन्होंने भी उचित निर्देशन दिया। यह मेरा सौभाग्य रहा कि उन्हें मेरे कार्य के प्रति पूरा विश्वास था। जब मेरा पीएच. डी. का वाईवा होना था उस समय डॉ. झा का बस्तर जाने का कार्यक्रम तय हो गया। उनकी अनुपस्थिति में डॉ. अग्रवाल ने चार्ज सम्हाला। मुझे पता चला कि इतिहासकार डॉ. एस. आर. शर्मा को मेरा वाईवा लेने आना है। मैंने डॉ. झा से कहा कि यदि वाईवा वाले दिन वे भी सागर में ही रहते तो अच्छा रहता, मुझे उनकी उपस्थिति से संबंल मिलता। तब डॉ. झा ने जो कहा, वह मुझे आज तक शब्दशः याद है-‘‘आपने शोध का अपना पूरा कार्य स्वयं किया है, फिर चिन्ता कैसी? परीक्षक जो भी पूछे उत्तर दे दीजिएगा। मुझे पूरा विश्वास है कि आराम से वाईवा दे लेंगी।’’ उनके इन शब्दों ने मुझे भरोसा दिलाया और मैंने सचमुच बहुत शांत भाव से अपना वाईवा दिया।’’ 

इसी दौरान उन्होंने इम्मानुएल ब्याज़ उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सागर में शिक्षिका का कार्य करना आरम्भ कर दिया था। इसके बाद स्थानीय जैन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में भी उन्होंने लगभग तीन साल शिक्षण कार्य किया। तदोपरांत डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के आडियो वीजुएल रिसर्च सेंटर में उनकी नियुक्ति असिस्टेंट प्रोड्यूसर के रूप में हो गई और शिक्षण कार्य से उनका नाता सदा के लिए टूट गया। ए.वी.आर.सी. में काम करते हुए उन्होंने अनेक शैक्षणिक फिल्मों के लिए पटकथालेखन, संपादन सहित फिल्म निर्माण का कार्य किया। किन्तु शीघ्र ही उन्हें अहसास हुआ कि वे एक कर्मचारी के रूप में बंधकर कार्य नहीं कर सकती हैं। तब उन्होंने स्वतंत्र लेखिका के रूप में लेखन कार्य करने एवं समाज सेवा से जुड़ने निर्णय लिया। उनके इस निर्णय के संबंध में वे बताती हैं कि -‘‘मेरे इस निर्णय ने मुझे अपने और परायों के भेद को अच्छी तरह समझा दिया। अरे लगी-लगाई नौकरी छोड़ दी कहते हुए कुछ लोगों ने मुंह मोड़ लिया लेकिन वहीं कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मेरे इस निर्णय का स्वागत किया। मेरे इस निर्णय में मेरा हर तरह से साथ दिया मेरी दीदी वर्षा सिंह ने।’’

शरद सिंह अपने अविवाहित रहने के संबंध में हंस कर कहती हैं कि ‘‘कोई ऐसा नहीं मिला जो मुझे पूरी तरह समझ पाता।’’



कृतित्व :

शरद सिंह जी ने बाल्यावस्था से ही लेखनकार्य शुरू कर दिया था। वे अपने लेखन एवं प्रकाशन के संबंध में बताती हैं कि -‘‘मुझे लेखन की प्रेरणा मिली अपनी मां डॉ. विद्यावती मालविकाजो स्वयं सुविख्यात साहित्यकार रहीं हैं। मेरी दीदी डॉ. वर्षा सिंह जो ग़ज़ल विधा की सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। मैं बचपन में मां और दीदी दोनों की रचनाएं पत्रा-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते देखती और सोचती कि किसी दिन मेरी रचनाएं भी कहीं प्रकाशित हों। इस संदर्भ में रोचक प्रसंग यह है कि उस समय मैं कक्षा आठ में पढ़ती थी। मैंने अपनी पहली रचना मां और दीदी को बिना बताए, उनसे छिपा कर वाराणसी से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र दैनिक ‘‘आज’’ में छपने के लिए भेज दी। कुछ दिन बाद जब वह रचना प्रकाशित हो गई और वह अंक मां ने देखा तो वे चकित रह गईं। यद्यपि उनसे कहीं अधिक मैं चकित रह गई थी। उस समय मुझे आशा नहीं थी कि मेरी पहली रचना बिना सखेद वापसीके प्रकाशित हो जाएगी। आज इस प्रसंग के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि उस समय जो भी साहित्य संपादक थे उनके हृदय में साहित्यिक-नवांकुरों को प्रोत्साहित करने की भावना अवश्य रही होगी। शेष प्रेरणा जीवन के अनुभवों से ही मिलती गई और आज भी मिलती रहती है जो विभिन्न कथानकों के रूप में मेरी कलम के माध्यम से सामने आती रहती है।’’

24 जुलाई 1977 को शरद सिंह जी की पहली कहानी दैनिक जागरण के रीवा (म.प्र.) संस्करण में प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था भिखारिन। स्त्री विमर्श संबंधी उनकी पहली प्रकाशित कहानी - काला चांदथी जो जबलपुर (म.प्र.) से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र दैनिक नवीन दुनिया, के नारीनिकुंजपरिशिष्ट में 28 अप्रैल 1983 को प्रकाशित हुई थी। इस परिशिष्ट का संपादन वरिष्ठ साहित्यकार राजकुमार सुमित्रकिया करते थे। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रथम चर्चित कहानी गीला अंधेराथी। जो मई 1996 में भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘‘वागर्थ’’ में प्रकाशित हुई थी। उस समय वागर्थके संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय थे।

‘‘फेमिना’’(हिन्दी संस्करण) के सितम्बर 2016 के अंक में प्रकाशित उनका वक्तव्य उनकी लेखनयात्रा से परिचित कराता है- ‘‘भाषा-शैली की दृष्टि से कच्ची सी कहानी। उस समय मेरी आयु 14 वर्ष थी। कविताएं, नवगीत, व्यंग्य, रिपोर्ताज़, बहुत कुछ लिखती रही मैं अपनी लेखन यात्रा में। उम्र बढ़ने के साथ जीवन को देखने का मेरा दृष्टिकोण बदला, अपने छात्र जीवन में कुछ समय मैंने संवाददाता के रूप में पत्रकारिता भी की। उस दौरन में मुझे ग्रामीण जीवन को बहुत निकट से देखने का अवसर मिला। मैंने महसूस किया कि शहरों की अपेक्षा गांवों स्त्रियों का जीवन बहुत कठिन है।

सच्चे अर्थों में मैं अपनी पहली कहानी गीला अंधेराको मानती हूं। यह कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका वागर्थके मई 1996 अंक में प्रकाशित हुई थी। गीला अंधेराको मैं अपनी डेब्यू स्टोरीभी कह सकती हूं। यह एक ऐसी ग्रामीण स्त्री की कहानी है जो सरपंच तो चुन ली जाती है लेकिन उसके सारे अधिकार उसकी पति की मुट्ठी में रहते हैं। स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराध को देख कर वह कसमसाती है। उसका पति उसे कोई भी क़दम उठाने से रोकता है, धमकाता है लेकिन अंततः वह एक निर्णय लेती है आंसुओं से भीगे गीले अंधेरे के बीच। इस कहानी में बुंदेलखंड का परिदृश्य और बुंदेली बोली के संवाद हैं।

मेरी इस पहली कहानी ने मुझे ग्रामीण, अनपढ़ स्त्रियों के दुख-कष्टों के क़रीब लाया। शायद यहीं से मेरे स्त्रीविमर्श लेखन की यात्रा भी शुरू हुई। अपने उपन्यासों पिछले पन्ने की औरतें’, ‘पचकौड़ीऔर कस्बाई सिमोनकी नींव में गीला अंधेराकहानी को ही पाती हूं। दरअसल, मैं यथार्थवादी लेखन में विश्वास रखती हूं और अपने आस-पास मौजूद जीवन से ही कथानकों को चुनती हूं, विशेषरूप से स्त्री जीवन से जुड़े हुए।’’ 

शरद सिंह का मानना है कि पत्रकारिता और फिल्म निर्माण के अनुभवों ने उनके लेखन को विविधता प्रदान की।

शरद सिंह जी ने यूनीसेफ, रेडियो एवं टेलीविजन के लिए अनेक धारावाहिक लिखे हैं।



टेलीफिल्म्स एवं डाक्यूमेंट्रीज़ :

   1. दूरदर्शन के लिए डाक्यूमेंट्रीज़ एवं टेलीफिल्म्स की पटकथा लेखनं।

   2. यूजीसी के लिए शैक्षिक टेली फिल्म्स की पटकथा लेखन एवं संपादन।

   3. यूनीसेफ एवं आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों के लिए रेडियो धारावाहिक लेखन।



मंचन  : छुई मुई डॉट कामनाटक का प्रसार भारती द्वारा देश के पांच शहरों में मंचन।



सम्मान एवं पुरस्कार :

1.            संस्कृति विभाग, भारत सरकार का गोविन्द वल्लभ पंत पुरस्कार -2000’ ‘न्यायालयिक विज्ञान की नई चुनौतियां’, पुस्तक के लिए।

2.            साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, म.प्र. शासन का ‘‘पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार’’

3.            मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘‘वागीश्वरी सम्मान

4.            ‘नई धारासम्मान, पटना, बिहार।

5.            ‘विजय वर्मा कथा सम्मान’, मुंबई ।

6.            ‘पं. रामानन्द तिवारी स्मृति प्रतिष्ठा सम्मान’, इन्दौर मध्य प्रदेश।

7.            ‘जौहरी सम्मान’, भोपाल मध्यप्रदेश।

8.            ‘गुरदी देवी सम्मान’, लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

9.            ‘अंबिकाप्रसाद दिव्य रजत अलंकरण-2004’, भोपाल, मध्य प्रदेश।

10.         ‘श्रीमंत सेठ भगवानदास जैन स्मृति सम्मान’, सागरमध्य प्रदेश।

11.         ‘कस्तूरी देवी चतुर्वेदी लोकभाषा लेखिका सम्मान -2004’, भोपाल, मध्य प्रदेश।

12.         ‘‘मां प्रभादेवी सम्मान’’, भोपाल, मध्य प्रदेश।

13.         ‘‘‘शिव कुमार श्रीवास्तव सम्मान’’, सागरमध्य प्रदेश।

14.         ‘‘पं. ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी सम्मान’’, सागरमध्य प्रदेश।

15.         ‘‘निर्मल साहित्य सम्मान’’, सागरमध्य प्रदेश।

16.         मकरोनिया नगर पालिका परिषद्, सागर द्वारा ‘‘नागरिक सम्मान’’

                 - आदि अनेक राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के सम्मान।



अनुवाद :  

1.            कहानियों का पंजाबी, उर्दू, उड़िया, मराठी एवं मलयालम में अनुवाद

2. दो कहानी संग्रह पंजाबी में अनूदित एवं प्रकाशित



शोध  : 

      शरद सिंह के कथासाहित्य पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध।



व्याख्यान :

अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी सिंहस्थ 2016 उज्जैन, चंडीगढ़ लिटरेचर फेस्टिवल, अजमेर लिटरेचर फेस्टिवल, अंतर्राष्ट्रीय इतिहास सेमिनार आदि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में साहित्य, इतिहास एवं पुरातत्व विषय पर व्याख्यान।



स्तम्भ लेखन :

1.            ‘नेशनल दुनिया’ (दिल्ली) में महिला कॉलम।

2.            ‘इंडिया इन साईड’ (लखनऊ) मासिक पत्रिका में वामामहिला कॉलम।

3.            ‘दैनिक आचरण’ (सागर) समाचारपत्र में बतकावव्यंग्य कॉलम।

4.            दैनिक सागर दिनकरसमाचारपत्र में चर्चा प्लसकॉलम।



ब्लॉग लेखन एवं वेब-संचालन : सन् 2010 से निरन्तर....

 शरदाक्षरा’                     


 समकालीन कथायात्रा’              


     ‘ए मिरर ऑफ इंडियन हिस्ट्री’    


    शरद सिंह’            




फेसबुक पेज संचालन : पिछले पन्ने की औरतेंसन् 2012 से निरन्तर....               




प्रमुख रेडियो धारावाहिक -

1.            आधी दुनिया पूरी धूप (स्त्री जागरूकता विषयक-नाट्य धारावाहिक -13 एपीसोड )

2.            मियां बीवी और शांताबाई (हास्य-नाट्य धारावाहिक -10 एपीसोड)

3.            गदर की चिनगारियां (1857 की क्रांति में महिलाओं के योगदान पर-नाट्य धारावाहिक- 13 एपीसोड)

4.            1857-बुन्देलखण्ड की क्रांतिभूमि के महायोद्धा (नाट्य धारावाहिक-13 एपीसोड)

5.            फैमिली नंबर वन (यूनीसेफ हेतु नाट्य धारावाहिक-13 एपीसोड)

6.            यूनीसेफ हेतु धरावाहिक के अंतर्गत् 04 एपीसोड

7.            आकाशवाणी भोपाल हेतु सॉफ्टवेयरप्रोडक्शन के अंतर्गत् 03 एपीसोड

8.            अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो (बाल धारावाहिक-13 एपीसोड )

9.            ज्ञान दर्शन (इग्नू) लखनऊ केन्द्र के लिए खजुराहो पर फीचर

10.         ‘‘सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानियां’’ (नाट्य धारावाहिक-13 एपीसोड)

11.         ‘‘बाबा नागार्जुन का कथा साहित्य’’ (नाट्य धारावाहिक-13 एपीसोड)



अन्य नाटक, फीचर ,वार्ताओं ,कहानियों एवं कविताओं का प्रसारण -

        आकाशवाणी के सागर, छतरपुर, भोपाल, लखनऊ, जयपुर  एवं दिल्ली केन्द्र से।         

टेलीविज़न हेतु - प्रमुख फीचर :

1.            गोदना  (लोकरंजन-फीचर फिल्म)

2.            नारे सुअटा और मामुलिया (लोकरंजन-फीचर फिल्म)

3.            बीवी ब्यूटी क्वीन   (लाफ्टर सीरियल)

4.            यही है ज़िन्दगी    (एड्स संबंधी नाटक)



टेलीविज़न हेतु फिल्म पटकथा - तुम्हें आना ही होगा



यूजीसी हेतु प्रमुख शैक्षिक फिल्में -

1.            शैलाश्रयों के भित्तिचित्र (धारावाहिक-शोध, पटकथा एवं संपादन)

2.            खजुराहो की मूर्तिकला (धारावाहिक-शोध, पटकथा एवं संपादन)

3.            देउरकोठार के बौद्ध स्तूप (पटकथा एवं संपादन)

4.            संत प्राणनाथ एवं प्रणामी सम्प्रदाय (शोध, पटकथा )

5.            गर्ल्स एन.सी.सी. (शोध, पटकथा एवं संपादन)

6.            प्रो.डब्ल्यू .डी.वेस्ट ,व्यक्तित्वः भाग-दो (शोध, पटकथा एवं संपादन)

7.            आयुर्वेद एक जीवन शैली (संपादन)







        डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की अब तक प्रकाशित पुस्तकें



उपन्यास  -



पिछले पन्ने की औरतें -बेड़िया समुदाय की स्त्रियों के जीवन पर आधारित उपन्यास                                                                        - चार संस्करण प्रकाशित.2005, 2007, 2009, 2014 सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

पचकौड़ी - सामाजिक विसंगतियों के कारण मानसिक, दैहिक शोषण का शिकार होते                                                                                              स्त्री-पुरुषों के जीवन पर आधारित उपन्यास-2009, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

कस्बाई सिमोन - उपन्यास-लिव इन रिलेशन पर आधारित उपन्यास, 2012, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002



स्त्री विमर्श -



पत्तों में क़ैद औरतें -तेंदूपत्ता संग्रहण एवं बीड़ी निर्माण से जुड़ी स्त्रियों के जीवन पर आधारित पुस्तक -2010,  सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

औरत : तीन तस्वीरें -वैश्विक-समाज के विभिन्न क्षेत्रों की स्त्रियों के जीवन पर आधारित पुस्तक -2014,  सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

डॉ. अम्बेडकर का स्त्रीविमर्श - 2012, भारत बुक सेंटर, 17, अशोक मार्ग,लखनऊ, उ.प्र.



कहानी संग्रह -



बाबा फ़रीद अब नहीं आते -स्त्रियों के जीवन को रेखांकित करता कहानी-1999, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

तीली-तीली आग -स्त्रियों के जीवन को रेखांकित करता कहानी संग्रह 2003, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

छिपी हुई औरत और अन्य कहानियां -स्त्री जीवन पर आधारित कहानियां-2009 वाणी प्रकाशन, 21-, अंसारी रोड, दरियागंज, नईदिल्ली

राख तरे के अंगरा - बुन्देलखण्ड के सामाजिक एवं स्त्रियों के जीवन पर कहानी संग्रह -2004 , सागर प्रकाशन, मकरोनिया चौराहा, सागर, म.प्र.

गिल्ला हनेरा - पंजाबी में अनूदित कहानी संग्रह गिल्ला हनेरा’ -2005, उड़ान पब्लिकेशन, मानसा, पंजाब-151505

श्रेष्ठ जैन कथाएं - जैन धर्म की उपदेशात्मक एवं ज्ञानवर्द्धक कहानियां-2008, सुनील साहित्य सदन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

श्रेष्ठ सिख कथाएं - जैन धर्म की उपदेशात्मक एवं ज्ञानवर्द्धक कहानियां-2012, सुनील साहित्य सदन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002



राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला -



दीनदयाल उपाध्याय - जीवनी -2015, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

श्यामा प्रसाद मुखर्जी - जीवनी -2015, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

वल्लभ भाई पटेल - जीवनी -2015, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

महामना मदन मोहन मालवीय- जीवनी -2016, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

महात्मा गांधी- जीवनी -2016, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

अटल बिहारी वाजपेयी - जीवनी -2016, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002



इतिहास -



खजुराहो की मूर्ति कला के सौंदर्यात्मक तत्व - खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्य पर विहंगमदृष्टि-2006, विश्वविद्यालय प्रकाशन,चौक, वाराणसी, उ.प्र.

प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास - प्राचीन भारत की सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्थाओं का विवरण -2008, विश्वविद्यालय प्रकाशन,चौक, वाराणसी, उप्र.



आदिवासी जीवन -



भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं - भारत की लगभग सभी जनजातियों में प्रचलित लोककथाएं -2009, नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया, नेहरू भवन,5, इंस्टीट्यूशनल एरिया,फेज़-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली - 110070

आदिवासियों का संसार -मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, इंटरनेशनल पब्लिशिंग कार्पोरेशन, 21-,अंसारी रोड, दरियागंज, नईदिल्ली-110002

आदिवासी परम्परा - मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, विद्यानिधि,  1/5971,कबूल नगर, शाहदरा, दिल्ली-110032 

आदिवासी लोक कथाएं -मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, साक्षरा प्रकाशन, सी-5/एस-2,ईस्ट ज्योति नगर, दुर्गापुरी चौक, शाहदरा, दिल्ली-110093

आदिवासी लोक नृत्य-गीत -मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, अरुणोदय प्रकाशन, 21-, अंसारी रोड, दरियागंज, नईदिल्ली-110002

आदिवासियों के देवी-देवता -मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, परम्परा प्रकाशन, सी-5/एस-2,ईस्ट ज्योति नगर, दुर्गापुरी चौक, शाहदरा, दिल्ली-110093

आदिवासी गहने और वेशभूषा -मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, साक्षरा प्रकाशन, सी-5/एस-2,ईस्ट ज्योति नगर, दुर्गापुरी चौक, शाहदरा, दिल्ली-110093

कोंदा मारो सींगा मारो -मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, मैत्रेय पब्लिकेशन, 4697/5, 21-, अंसारी रोड, दरियागंज, नईदिल्ली-110002

शहीद देभोबाई -मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, नवोदय सेल्स, 21-, अंसारी रोड, दरियागंज, नईदिल्ली-110002

मणजी भील और बुद्धिमान वेत्स्या -मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर-2005, साक्षरा प्रकाशन, सी-5/एस-2,ईस्ट ज्योति नगर, दुर्गापुरी चौक, शाहदरा, दिल्ली-110093



लोककथाएं -



बुंदेली लोककथाएं - बुंदेलखंड में प्रचलित लोककथाएं -2015, साहित्य अकादमी, रवीन्द्र भवन, 35 फिरोजशाह मार्ग, नई दिल्ली - 110001



नाटक संग्रह -



आधी दुनिया पूरी धूप - नारी सशक्तिकरण पर आधारित रेडियोनाट्य-श्रृंखला -2006, आचार्य प्रकाशन, 190 बी/10, राजरूपपुर, इलाहाबाद, उ.प्र.

गदर की चिनगारियां - 1857 के स्वतंत्रतासंग्राम में स्त्रियों के योगदान पर -2011, सस्ता साहित्य मंडल, एन-77, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली-110001



विज्ञान -



न्यायालयिक विज्ञान की नई चुनौतियां -न्यायालयिक विज्ञान का परिचय एवं नई चुनौतियां -दो संस्करण प्रकाशित-2005, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

सौर तापीय ऊर्जा - सस्ते एवं सुरक्षित ऊर्जा स्रोत के रूप में दैनिक जीवन में सौरतापीय ऊर्जा के उपयोग पर प्रकाश-2006, भारत बुक सेंटर, 17, अषोक मार्ग,लखनऊ, उ.प्र.



धर्म-दर्शन -



महामति प्राणनाथ : एक युगान्तरकारी व्यक्तित्व -संत प्राणनाथ के विचार एवं दर्शन- 2002, प्राणनाथ मिशन, 72, सिद्धार्थ एंक्लेव, आश्रम चौक, नई दिल्ली-14

श्रेष्ठ जैन कथाएं - जैन धर्म की उपदेशात्मक एवं ज्ञानवर्द्धक कहानियां-2008, सुनील साहित्य सदन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

श्रेष्ठ सिख कथाएं - जैन धर्म की उपदेशात्मक एवं ज्ञानवर्द्धक कहानियां-2012, सुनील साहित्य सदन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002



साक्षरता विषयक -



बधाई की चिट्ठी -नवसाक्षरों हेतु प्रेरणास्पद कथा-दो संस्करण-1993, 2000, सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

बधाई दी चिट्ठी -बधाई की चिट्ठी का पंजाबी में अनुवाद-1998, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, चंडीगढ़, पंजाब

बेटी-बेटा एक समान - नवसाक्षरों हेतु प्रेरणास्पद कथा- दो संस्करण-1993, 2000,  सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

महिलाओं को तीन ज़रूरी सलाह- नवसाक्षरों हेतु प्रेरणास्पद कथा-2004, कल्याणी शिक्षा परिषद, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

औरत के कानूनी अधिकार - नवसाक्षरों हेतु प्रेरणास्पद कथा -2004, कल्याणी शिक्षा परिषद, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली.110002

मुझे जीने दो, मां! -नवसाक्षरों हेतु प्रेरणास्पद कथा-2005, ऋचा प्रकाशन, डी-36,साउथ एक्सटेंशन भाग-एक, नई दिल्ली-110049

फूल खिलने से पहले - सुरक्षित मातृत्व के उपायों को रेखंकित करती नवसाक्षरों हेतु प्रेरणास्पद कथा-2005, परंपरा पब्लिकेशन, सी-4,ईस्ट ज्योति नगर, दुर्गापुरी चौक, शाहदरा, दिल्ली-110093

मां का दूध - स्तनपान के महत्व को रेखंकित करती नवसाक्षरों हेतु प्रेरणास्पद कथा- 2005, उत्तम प्रकाशन, 1/5971,कबूल नगर, शाहदरा, दिल्ली-110032

दयाबाई - नवसाक्षरों हेतु प्रेरणास्पद कथा-2006, नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया, नेहरू भवन,5, इंस्टीट्यूशनल एरिया,फेज़-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली - 110070

जुम्मन मियां की घोड़ी - नवसाक्षरों हेतु पुन्नी सिंह की कहानी का रूपान्तरण-दो संस्करण-2005, 2007, नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया, नेहरू भवन,5, इंस्टीट्यूशनल एरिया,फेज़-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली - 110070



काव्य -



पतझड़ में भीग रही लड़की -ग़ज़ल संग्रह -2011, आचार्य प्रकाशन, इलाहाबाद

आंसू बूंद चुए -नवगीत संग्रह -1988, मुकेश प्रिंटिंग, सागर, म.प्र.

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